अक्रम विज्ञान मार्ग (आध्यात्मिक विज्ञान)द्वारा आत्मसाक्षात्कार-आत्मज्ञानी परम पूज्य दादा भगवान…

अक्रम विज्ञान आत्मसाक्षात्कार पर आधारित है। इस विज्ञान से हमें जीवन की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान मिलता हैं ताकि कर्म बंधन न हो ।
किसी भी मनुष्य को दुख पसंद नही हैं ,निरंतर सुख की ख़ोज करता रहता हैं इसके लिये वह अलग अलग जगह भटकता रहता हैं ताकि सच्चा सुख प्राप्त कर सके ।अपने सच्चे स्वरूप द्वारा ही शाश्वत सुख की प्राप्ति हो सकती है| मूलजी अंबालाल पटेल जिन्हे दादा भगवान के नाम से भी जानते हैं। उन्हें शाश्वत सुख का मार्ग मिल गया था। उन्होंने इस संसार को एक एक बेजोड़ आध्यात्मिक विज्ञान दिया है, जो अक्रम विज्ञान के नाम से जाना जाता है।…..दादाभगवान.अक्रम विज्ञान आत्मसाक्षात्कार पर आधारित है। इस विज्ञान से हमें जीवन की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान मिलता हैं ताकि कर्म बंधन न हो । आत्मज्ञानी की बारे और बात करने से पहले और भी कुछ जाने ……,

मोक्ष प्राप्ति की इच्छा किसे नहीं होती? लेकिन प्राप्ति का मार्ग मिलना कठिन है । मोक्षमार्ग पर ज्ञानी पुरूष के सिवा उस मार्ग पर कौन ले जाएगा? इस काल में इस क्षेत्र(भरत क्षैत्र) में वर्तमान तीर्थंकर नहीं हैं ,लेकिन महाविदेह क्षेत्र में विचरते प्रत्यक्ष वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी जी विराजमान है भरत क्षेत्र से सीधा मोक्ष नहीं है ,लेकिन महाविदेह क्षेत्र में श्री सीमंधर स्वामी के दर्शन से मोक्ष प्राप्त हो सकता हैं । परम पूज्य दादाश्री उसी मार्ग से मुमुक्षुओं को मोक्ष पहुँचाते हैं।प्रत्यक्ष-प्रकट तीर्थंकर के प्रति भक्ति जागना और साथ ही दिन-रात उनकी आराधना और सतत संधान करके, उनके साथ ऋणानुबँध गाढ़ करना – परम अवगाढ होने पर ही उनके चरणकमल मे ही स्थान प्राप्ति की मोहर लगती हैं ।उनके प्रत्यक्ष दर्शन पाकर केवलज्ञान प्राप्त होना, यही मोक्ष का प्रथम से अंतिम मार्ग है, ज्ञानी ऐसा बताते हैं और वह अक्रम ज्ञान द्वारा प्राप्त आत्मज्ञान और पाँच आज्ञाओं के पालन से हो सकता है।श्री सीमंधर स्वामी की अनन्य भक्ति, दिन-रात आराधना करते करते उनके साथ ऋणानुबंध स्थापित होता है, जो इस देह के छूटते ही, वहाँ जाने का रास्ता बना देता है!

कुदरती नियम ऐसा है कि जैसी आंतरिक परिणतियाँ होती हैं उसी अनुसार अगला जन्म निश्चित होता है। अभी भरत क्षेत्र में पाँचवां ‘आरा’चल रहा है। सभी मनुष्य कलियुगी हैं । अक्रम विज्ञान द्वारा ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी की आज्ञा का पालन करे तो आंतरिक परिणतियाँ एकदम उच्च स्तर पर पहुँच जाती हैं ।वे कलियुगी में से सतयुगी बन जाती हैं ।सीमंधर स्वामी की भक्ति से उनके साथ ऋणानुबंध पहले से ही बाँध लिया होता है और क़ुदरती तौर से मृत्यु के बाद जीव वहीं उनके समीप, चरणों में खिंच जाता है।वहॉ तीर्थंकर भगवान के दर्शन करते ही केवलज्ञान प्राप्त हो जाता हैं फिर मनुष्य मोक्ष चला जाता हैं ।अब ज्ञानीपुरूष के बारे बात करते हैं।
ज्ञानीपुरुष वे हैं, जिनकी खुद की आत्मा जागृत हो चुकी है और जो औरों को भी आत्मज्ञान की प्राप्ति करवा सकते हैं। सिर्फ ज्ञानीपुरुष ही, हम सभी को सांसारिक बंधनों से मुक्त करवा सकते हैं।प्रत्यक्ष ज्ञानी से ही आत्मज्ञान प्राप्त हो सकता है। ऐसे ही ज्ञानीपुरुष जिनका नाम परम पूज्य अंबालाल मूलजीभाई पटेल। जिनको दादाश्री और दादा भगवान के नाम से जानते हैं ।

दादाजी का जीवन……

अठारह साल की उम्र में उनका विवाह हीराबा के साथ हुआ। विवाह के कुछ समय बाद ही एक बीमारी में हीराबा की एक आँख चली गई। संपूर्ण विवाहित जीवन में कभी भी उनका हीराबा के साथ झगड़ा नहीं हुआ।

उनका जीवन बहुत ही सादा और सरल था।उन्होंने कभी भी व्यापार में हुए नफे के पैसे का उपयोग नहीं किया।अपने बिज़नेस पार्टनर को उन पैसों से उसकी बेटी की शादी और अन्य ज़रूरत के लिए खर्च करने के लिये भी अनुमति दे रखी थी ।वे अपने खर्चे पर लोगों को धार्मिक यात्रा पर भी ले जाते थे,उन्होंने अपने निजी खर्चे के लिए कभी भी किसीसे एक पैसा तक नहीं लिया।

अहिंसा पालन करने के प्रति उनकी जागृति इतनी अधिक थी कि कभी यदि अगर वे रात को देर से घर लौटते थे तो, वे अपने जूते निकाल कर नंगे पैर सड़क पर चलते थे ताकि जूतों की आवाज़ से सड़क पर सोए हुए कुत्ते नींद से न जग जाएँ।

वे सांसारिक जीवन को एक अलग ही दृष्टि से देखते थे । ”बचपन से ही मैंने संसार के भयावह स्वरूप को देख लिया था। प्रतिक्षण भय, दुःख और परेशानियाँ हैं। इसलिए मैं संसार की किसी भी चीज़ या काम में गहरा नहीं उतरता था। पता नहीं कौन-सी घड़ी देह छोड़ना पड़े, क्या पता”? उनका दिमा़ग हमेशा उच्च आध्यात्मिक विचारों में ही डूबा रहता था। शाश्वत सत्य और आत्मज्ञान की खोज में उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। 

दादाजी के शब्द……

मैं खटमल को भी अपने आपको काटने देता। मैं खटमल से कहता ‘अब तुम आ ही गए हो तो अच्छी तरह भोजन करके जाओ। भूखे मत जाना’। मेरा यह शरीर एक ऐसा ‘होटल’ है कि यहाँ पर जो भी आए, उसे सुख मिले और इससे किसीको कभी दुःख न हो। मेरी ‘होटल’ का यह बिज़नेस था। इस प्रकार मैंने खटमल को भी खाना खिलाया। अगर मैं नहीं खिलाता तो क्या कोई मुझ पर फाइन लगाता? नहीं! मेरा ध्येय सिर्फ आत्मा की प्राप्ति का ही था। मैं लगातार इन नियमों का पालन करता था-सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना, कंदमूल नहीं खाना और हमेशा उबला हुआ पानी ही पीना। अपनी अध्यात्मिक खोज में मैंने कुछ भी बाकी नहीं रखा और देखो पूरा अक्रमविज्ञान प्रकट हों गया, यह विज्ञान जो कि पूरे विश्व को प्योर बना दे ऐसा विज्ञान है”!!

दादाजी की आत्मज्ञान होने से सम्बन्धित विवरण ….👇👇

सन 1958 की एक शाम 6 बजे सूरत की भीड़भाड वाले रेल्वे स्टेशन पर बैंच नम्बर 3 पर विराजमान श्री अंबालाल मूलजीभाई पटेल को देहरूपी मंदिर में क़ुदरती रूप से अदभुत आश्चर्य प्रकट हुआ।शुरू से उनको शाश्वत सत्य को जानने के अलावा कोई इच्छा नही थी ।अनंत जन्मों की खोज का अंत आया और उनकी आत्मा पूर्ण से आवरण रहित हो गई और वे आत्मज्ञानी बन गये ,उनके भीतर चौदह-लोक के नाथ प्रकट हुए।।एक ही घंटे में ब्रह्मांड के सभी रहस्य उनके सामने खुल गए। सभी प्रश्न जैसे कि मैं कौन हूँ, भगवान कौन हैं, यह दुनिया कौन चलाता है, कर्म क्या है, मोक्ष क्या है वगैरह वगैरह….के उत्तर उन्हें मिल गए।

[वे इस भगवान (आत्मा)को, ‘दादा भगवान’ कहते थे| वे कहते थे, “ये भगवान, दादा भगवान मुझमें पूर्ण रूप से प्रकट हो चुके हैं| वे सभी जीवों में विराजमान हैं| फर्क सिर्फ इतना हे कि मुझमें वे पूर्ण रूप से प्रकट हो चुके हैं और आप में अभी प्रकट होने बाकी है|जगत की किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं होने के कारण, मुझ में यह अपूर्व सिद्धि प्रकट हुई हैं …….परम पूज्य दादाश्री]

ज्ञानी पुरुष पूज्य दादाश्री के आत्मज्ञान के बाद का जीवन……दादाजी के शब्दों में…..[ मैं संसार में एक क्षण के लिए भी नहीं रहता। सांसारिक जीवन में रहने का मतलब है कि अनात्मा में रहना। मैं हमेशा आत्मा में रहता हूँ। मैं हमेशा अध्यात्म की जागृति अर्थात् मोक्ष में रहता हूँ” ]

इस ज्ञान से आत्मा का अनुभव हुआ और उनका अहंकार जो उनके लिए दुःख का कारण था, वह पूर्ण रूप से खत्म हो गया। अब नई अलौकिक दृष्टि से वे सभी जीव मात्र में शुद्धात्मा देखते थे। उनकी वाणी में शुद्ध ज्ञान निकलने लगा। जिससे उनके आसपास के लोग भी बहुत प्रभावित होने लगे।उन लोगों को दादाश्री के सानिध्य में रहना अच्छा लगने लगा। प्रेम से वे उन्हें दादाश्री और दादा भगवान बुलाने लगे। 
उनकी दिल की इच्छा थी कि ‘जो सुख मुझे मिला, वह सभी को मिले’। उन्होंने सत्संग करना और लोगों को आत्मज्ञान देना शुरू किया। सन् 1968 में 23 वर्षीय मेडिकल छात्रा नीरुबहन अमीन जब दादाजी से मिली और आत्त्मज्ञान की प्राप्ति की तो दादाजी की आध्यात्मिक शक्ति को तुरन्त पहचान लिया। उन्होंने तुरन्त ही अपने मेडिकल को छोड़कर अपना जीवन ज्ञानीपुरुष की सेवा में अर्पण करने का निश्चय कर लिया। जब कभी भी सत्संग की बात आती तो परम पूज्य दादाश्री ने कभी अपनी तबियत और आराम का ध्यान नहीं रखा। दादाजी और नीरूबेन दोनों अपने खुद के खर्चे से देश-विदेश में घूम-घूमकर सत्संग और ज्ञानविधि देते थे।उनके सत्संग हमेशा प्रश्नोत्तरी के रूप में होते थे। उनके उत्तर हमेशा प्रश्नों का पूर्ण समाधान करवाने वाले और अध्यात्मिक प्रगति करवाने वाले होते थे।वे प्रश्नकर्त्ता को समाधानपूर्वक सांसारिक जीवन जीने का रास्ता भी बताते थे।

परम पूज्य दादाश्री का देहनिर्वाण 2 जनवरी 1988 शनिवार को बड़ौदा में समाधिपूर्वक हुआ  उन्होंने अंतिम क्षण तक स्वाध्याय ,ज्ञान विधी , भक्ति आदि द्वारा लाखों लोगों के लिये आत्मसाक्षात्कार के द्वार खोलकर सबको शाश्वत सुख की प्राप्ति करवाई। जगत कल्याण की ज़िम्मेदारी उन्होंने पूज्य नीरुमॉ और पूज्य दीपकभाई को सौंप दी।दादाश्री ने पूज्य नीरुमॉ को ज्ञानविधि और सत्संग करने की सिद्धि प्रदान की और पूज्य दीपकभाई को सत्संग करने का आशीर्वाद दिया।​परम पूज्य दादाश्री के अक्रम विज्ञान का ज्ञान जैसे जैसे फैलने लगा, वैसे-वैसे सत्संग और ज्ञानविधि जगह जगह होने लगी ।परम पूज्य दादा भगवान के कहे अनुसार, सन् 2003 में पूज्य नीरूमॉ ने पूज्य दीपकभाई को विशेष सिद्धि के साथ ज्ञानविधि कराने का आशीर्वाद दिया था। पूज्य दीपकभाई और पूज्य नीरू माँ के अथक प्रयत्नों से लाखों लोग आत्मज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन में सुख और शांति का अनुभव कर रहे हैं।​

​         19मार्च 2006 को पूज्य नीरू माँ ने नश्वर देह का त्याग किया और अब पूज्य दीपकभाई के मार्गदर्शन में सत्संग और ज्ञानविधी जगह जगह हो रही है। वे परम पूज्य दादाश्री द्वारा बताए गए प्रत्येक सिद्धांत का पूर्ण रूप से पालन करते हैं। वे प्योरिटी और परम विनय की प्रतिमूर्ति है। जिसे देखकर सभी लोग प्रेरणा पाते हैं।

 ज्ञानीपुरुष की कृपा से सिर्फ दो घंटों की विधि (ज्ञानविधि) द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त हो सकता है। अनेकों ने इस शाश्वत सुख का अनुभव किया है! आप भी इस सुख को प्राप्त कर सकते हैं!

अडालज का त्रिमंदिर (अहमदाबाद)निष्पक्षपाती मंदिर..अहमदाबाद से कुछ ही दूरी पर अडालज में अक्रम विज्ञानी परम पूज्य दादाश्री से प्रेरित भव्य निष्पक्षपाती त्रिमंदिर स्थित हैं । जिसके मध्य में 13 फीट ऊँची भगवान श्री सीमंधर स्वामी की मूर्ति स्थापित है, और दोनों तऱफ शासन देव श्री चांद्रायण यक्ष देव और शासन देवी श्री पाँचागुली देवी की प्रतिमा हैं।यहाँ पर तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभदेव भगवान, श्री अजीतनाथ भगवान, श्री पार्श्वनाथ भगवान और श्री महावीर भगवान, एवं शासन देवी श्री चक्रेश्वरी देवी और श्री पद्मावती देवी की प्रतिमा भी हैं। मंदिर के बायीं ओर शिवलिंग, पार्वती देवी, हनुमानजी और गणपति देव की प्रतिमा हैं। जब कि दायी ओर योगश्वर श्री कृष्ण भगवान ,तिरुपति बालाजी भगवान और श्रीनाथजी भगवान, श्री भद्रकाली माताजी और श्री अंबा माताजी की प्रतिमा हैं। मंदिर के दोनों बाहरी किनारों पर एक तऱफ श्री पद्मनाभ प्रभु और दूसरी तरफ संत शिरोमणि श्री सांईबाबा की प्रतिमा हैं।त्रिमंदिर जाते ही बहुत सुखद अनुभूति का अहसास होने लगता हैं।

                      जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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