माहौल या वातावरण का प्रभाव ….

माहौल या वातावरण का प्रभाव …

आज के वेज्ञानिक युग में जिंदगी भागदौड़ वाली होती जा रही हैं ।किसी को भी दूसरे के लिये समय नही ।सभी एक ही भेड़ चाल से भागे जा रहे हैं । रिश्ते नातों मे तो ऐसा लगता है कि जब तक मेरा काम है तब तक तुझको सलाम हैं वाली बात चरित्रात हो रही हैं ।सब दिखावे मे रिश्ता निभा रहे है ,अपनत्व वाली बात ही नही रही ।

पाश्चात्य देशों की संस्कृति का बोलबाला बढ़ता जा रहा हैं । व्यक्ति जिसके साथ ज्यादा उठता बैठता हो या जिसको पसंद करता हो तो वो उसकी धीरे धीरे आदतें अपनाने लगता हैं चाहे वह अच्छी हो या बुरी आदत । उसी आदत के अनुसार घर परिवार का माहौल बनने लगता हैं ।इंसान जैसे माहौल मे रहता हैं यदि उसके विपरीत माहौल मिलता हैं तो वह उस माहौल को एडजस्ट नही कर पाता हैं और उसी हिसाब से उसकी प्रतिक्रिया आने लगती हैं।उदाहरण के लिये यदि धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्ति को रंगीन जिंदगी की दुनिया मे ले जाना चाहे तो वहॉ ये व्यक्ति एकदम उदासीन ,बुझे बुझे लगेंगे ,इनको इस माहौल मे बिल्कुल रस नही आयेगा ।इसके विपरीत रंगीन मिजाजी व्यक्ति जो शराब ,पर स्त्री ,जुऑ या ऐसे बोल सकते हैं कि बुरी आदतों का शौक़ीन हो तो वह धार्मिक या आध्यात्मिक जगह पर जाकर बीमार हो जायेगा ।
माहौल या वातावरण के नाम पर एक कहानी याद आती हैं जो बचपन से सुनती आ रही हूँ वो इस प्रकार हैं ।
एक समय की बात हैं एक नगर का राजा जो अलग अलग किस्म के जानवर पालने का शोकीन था ।उसके मन में पता नही एक दिन सूअर पालने का शौक हुआ और उसने एक सूअर पाला भी । राजा उसका पूरा ध्यान रखता । उसकी सारी देखरेख एक शाही अंदाज में होती ।

 इस राजसी सूअर को प्रति दिन अच्छे से नहला कर इत्र लगाया जाता और मखमल के गद्दी पर बैठा दिया जाता ।प्रति दिन यही राजसी सुअर के साथ किया जाता ।धीरे धीरे दिन गुज़रते गये । इतना ध्यान रखते हुये भी एक महीने में ही सूअर एकदम से बीमार हो गया चलने में दिक्कत होने लगी ।आखिरकार राजा ने पूरे राज्य में यह खबर भेजवाई की,जो भी मेरे सूअर को ठीक करेगा उसे आधा राज्य सौप दिया जाएगा काफी लोगो ने सुअर को ठीक करने की कोशिश की लेकिन कामयाब नही हुये ।दिन पर दिन बीतते गये ,राजा की चिंता बढ़ने लगी ।फिर कुछ दिन के बाद एक व्यक्ति जो सूअर पालन का कार्य करता था वो राज्य दरबार में पहुचॉ और राजा से कहा की राज्य दरबार में एक गड्ढा खुदवाया जाये ।राजा ने दरबार के बीच गड्ढा खुदवाया ।फिर उस सूअर पालने वाले ने राजा से कहा की इस गड्ढे में कीचड और राज्य की पूरी गंदगी डाली जाये ।

सभी राज दरबारियों ने कहा की ये गलत है ,पर राजा भी क्या करता उसकी इच्छा थी कि सूअर कैसे भी कर के ठीक हो जाए।सो राजा ने आदेश किया की राज्य की गन्दगी और कीचड उस राज्य दरबार के गड्ढे में भरा जाए।फिर क्या था राजा के आदेशानुसार कीचड़ और पूरे राज्य की गंदगी उस गड्ढे में भर दिया गया । थोड़ी ही देर में पूरे दरबार के भीतर उस कीचड की दुर्गन्ध फ़ैल गयी।जैसे ही दुर्गन्ध सूअर को मिली वो खड़ा हो गया और कीचड़ की तरफ देख कर दौड़ा फिर उस कीचड़ में जा कर लोट-पोट होने लगा।धीरे धीरे सूअर की हालत में सुधार होने लगा ।और जल्द ही ठीक हे गया ।

इस कहानी को बताने का मतलब यह हैं कि जिन लोगो की आदत जिस माहौल में पड़ जाती हैं वह उससे बाहर निकलना ही नही चाहते पूरी जिंदगी उसी में ख़र्च कर देता हैं चाहे वह उसके हित में न भी हो 

हर क्षैत्र का माहौल अलग अलग प्रकार से होता है ।

एक सुंदर कविता …..

थे रिश्वत देणीं बंद करो,लेवणियां भूखां मर जासी

थे घास नांखणीं बंद करो,सरकारी सांड सुधर जासी

खुद रो घर रो करो सुधारो,आॉखो गांव सुधर जासी
थे भाव देवणां बंद करो,घणा रा भाव उतर जासी

दूजां मे खामियॉ नही देखो,खामियॉ खुद में ही मिल जासी
जरे थे खुद चोखा बनोला पाडोसी चोखा मिल जासी

थे कालो पूंजी लेवणों बंद करो,दो नंबर री पूंजी घट जासी
ईमान धरम पर चालोला,तो पाप फटाफट कट जासी

बेटी री कदर करनो सीख जासी जने झांसी री रानी आ जासी।

पन्ना,मीरां और पदमनिया सीतां सावित्री आ जासी

आजादी रो मतलब समझासी भारत रो रूप बदल जासी

थे एक होवने रेवोला,तो लडाई झगड़ा मिट जासी

मेहनत री रोटी खावोला , तो बेईमानी घट जासी
झूठो वादो में मती फँसजो वादो री हवा निकल जासी

थे नेक धरम पर चालोला, जीऊणो ढंग बदल जासी

मेहनत,हक़ रो मोती बोयां सुं धरती रो रंग बदल जासी

धर्म री इज्जत करोला तो गीतां री राग बदल जासी

दोस्तों आलस छोड़ो तो, भाररो नक्शो बदल जासी

लिखने में गलती हो तो क्षमाप्राथी 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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