प्रेम -सुखद अहसास-जिंदगी की किताब (पन्ना # 9)

प्रेम -सुखद अहसास …..

प्रेम एक अहसास है जो किसी की दया, भावना और स्नेह जताने का तरीका है। खुद के प्रति, या किसी जानवर के प्रति, या किसी इनसान के प्रति ,किसी के भी प्रति स्नेहपूर्वक कार्य करने को प्यार या प्रेम कह सकते हैं। प्रेम चेतन की एक अवस्था हैं । मनुष्य-जीवन का सारा मेहनत ,सारी भागदौड़, सारा संघर्ष अंतिम रूप से प्रेम पर ही टिका है।सबके प्रति प्रेमभाव वाला व्यवहार हो तो पूरी ज़िंदगी बदल जाती हैं ।प्रेम का अभाव होने से सारी ज़िंदगी सारहीन लगती हैं । 

आधुनिक ज़माने में चाहे हमारे पास भोग विलासिता के लिये कितने ही साधन हो ,कितना भी धन हो ,लोगों के सामने अपने नाम या मान सम्मान का कितना ही बोलबाला हों,लेकिन फिर भी उसको जीवन में कुछ न कुछ ख़ालीपन का एहसास रहता ही है या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उसको इन सबसे तृप्ति का अनुभव नही होता हैं क्यों कि उसे जो कुछ भी प्राप्त हो रहा हैं उसमें प्रेम या प्यार की वास्तविक अनूभुती का अभाव होता हैं और उसको पाने के लिये वह सारी उम्र दौड़भाग करता रहता हैं ।

प्रत्येक जीवमात्र पूरे जीवन में एक दूसरे से प्रेम पाने की लालसा रखता हैं ।प्रेम मिलने पर उसको अपना जीवन सार्थक लगता हैं और ना मिलने पर सारहीन यानि उदासीन लगता हैं।

 जहॉ सबकुछ हैं , लेकिन प्रेम नही हैं तो उससे बड़ा कोई कंगाल नही । जहॉ कुछ भी नही लेकिन प्रेम हैं तो उससे बड़ा कोई अमीर नही ।

इसी तरह परिवार की बात करे तो इसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य का आपस मे प्रेमपूर्ण व्यवहार होने पर ज़िंदगी में चाहे कितनी भी समस्या आ जाये लेकिन समस्या को उस परिवार से अलविदा कहना ही पड़ता हैं। प्रेम से जो चीज़ जीती जा सकती हैं वह किसी और से नही जीती जा सकती हैं ।इसलिये कहा जाता हैं ….

1.चाहे इंसान छोटा हो या बड़ा (उम्र या हैसियत)सभी में सदा प्रेम (प्यार)बांटते रहेो । 

2.जरूरी नहीं जो इंसान खुद के लिए कुछ नहीं करते वो दूसरों के लिए भी कुछ नहीं करेंगें ।कुछ इंसान ऐसे भी होते हैं जो ख़ुद का ख़्याल न रखकर जगत के लिये हमेशा कुछ न कुछ करने को हमेशा तत्पर रहते हैं उनकी निस्वार्थ प्रेम की भावना होती हैं 

3.कुछ परिवार में भी ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने परिवार को उच्चा उठाने में अपनी सारी खुशियाँ दॉव पर लगा दी ।

4.कोई बात तुम किसी से नाराज़गी दिखाकर या क्रोध दिखाकर नहीं जीत सकते वह तुम प्रेम से जीत सकते हो।

5.यह भी समझा जाता हैं कि जिस परिवार के सदस्यों में आपस में प्रेमभाव होता हैं वहॉ देवीजी की हमेशा कृपा बनी रहती हैं।

प्रेम के ऊपर लघु कथा ……

एक धनी व्यक्ति से लक्ष्मी जी रूठ गई ।जाते वक्त बोली “मैं जा रही हूँ “और मेरी जगह नुकसान (दरिद्र्ता )आ रहा है ।तैयार हो जाओ।लेकिन जाने से पहले मै तुम्हारी अंतिम इच्छा पूरी करना चाहती हूँ।मांगो जो भी मॉगना हो।

वह व्यक्ति बहुत समझदार था ।उसने लक्ष्मीजी से विनती की बोला कि दरिद्रता आती हैं तो आने दो ।मुझे परवाह नही लेकिन मेरे परिवार में आपसी प्रेम बना रहे ।बस मेरी यही इच्छा है।

लक्ष्मी जी ने “तथास्तु”कहा और चली गई।उसके कुछ दिन के बाद ही उस व्यक्ति के यहॉ व्यापार में घाटा होने लगा और पैसों की खपत होने लगी।

एक दिन बनिए की सबसे छोटी बहू खिचड़ी बना रही थी ।उसने नमक आदि डाला और अन्य काम करने लगी ।तभी दूसरे लड़के की बहू आई और उसने भी बिना चखे नमक डाला और चली गई ।इसी प्रकार तीसरी ,चौथी बहुएं आई और बिना चखे नमक डालकर चली गई । थोड़ी देर बाद सास आई उसने सोचा सभी बहुँरानियाँ दूसरे काम में व्यस्त हैं ,चलो मैं ही नमक डाल देती हूँ ।उनकी सास ने भी नमक डाल दिया।खिचड़ी तैयार हो गई।

शाम को सबसे पहले भोजन करने पिता आया ।जैसे ही पहला निवाला मुँह में रखा ,देखा बहुत ज्यादा नमक है।लेकिन उसने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक चुपचाप बिना किसी शिकायत के खिचड़ी खाई और चला गया ।इसके बाद बङे बेटे का नम्बर आया उसने भी पहला निवाला मुँह में रखा और पूछा पिताजी ने खाना खा लिया ।क्यॉ कहा उन्होंने ?

सभी ने उत्तर दिया ,हाँ उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक खा लिया ,कुछ नही बोले।

अब लड़के ने सोचा जब पिता जी ही कुछ नही बोले तो मै भी चुपचाप खा लेता हूँ।

इस प्रकार घर के अन्य सदस्य एक -एक करके आए ।पहले वालो के बारे में पूछते और चुपचाप खाना खा कर चले जाते।

यह सब नजारा वहॉ पर वास कर रही दरिद्रता देख रही थी और सोच रही थी कि कब खिचड़ी के नमक वाली बात को लेकर ये सब आपस में लड़े ताकि मेरा यहॉ पर रहना ज़्यादा से ज्यादा हो लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ।

रात को दरिद्रता आई और हाथ जोड़कर सेठजी से बोलने लगी कि मै जा रही हूँ।

सेठजी ने पूछा- क्यों ?

तब दरिद्रता कहती है आप लोग तो इतना नमक खा गए लेकिन आपस में बिलकुल भी नही झगड़ें । जहॉ झगड़ा नही वहॉ मेरा कोई काम नहीं और वह चली गई।ऐसा होने पर लक्ष्मीजी को वापस सेठजी के यहॉ स्थायी रूप से आना पड़ा लक्ष्मीजी के आने से व्यापार में फायदा होने के साथ साथ आपसी प्रेम मे भी बढ़ोतरी होने लगी ।

जहॉ प्रेम हैं वहॉ सबकुछ हैं।

प्रेम ही एक ऐसा द्वार है जो जो हमारे अहंकार को तोड़ता हैं और हम अनंत सुख को महसूस करने की शुरूआत करते हैं।

प्रेम जब आपका स्वभाव बन जाता हैं तो उठते, बैठते, सोते, जागते; अकेले में, भीड़ में, वह फूल की सुगंध की तरह और दीये की रोशनी की तरह उसका चारों और फैलता हैं ।

गुरू शिष्य के प्रेम में प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी काबिलियत के अनुसार किसी भी क्षैत्र में आगे बढ़ने के लिये गुरू से मार्गदर्शन लेता है इसलिये उन्हें गुरू की महत्त्वता का अहसास होता हैं तो कल्पना करें कि जो हमें जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाते हैं, उस ज्ञानी का महत्त्व कितना होगा गुरु और शिष्य के संबंध पवित्र होते हैं। गुरु को शिष्य के प्रति निरपेक्ष और बिना शर्त वाला प्रेम होता है ।

असली प्रेम करने का अर्थ है, दूसरों पर बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करना। यह प्रेम अपेक्षा युक्त सांसारिक प्रेम से भिन्न बिना किसी शर्त के, भेदभाव के,सर्वव्यापी ईश्‍वरीय प्रेम, जो ईश्‍वर द्वारा निर्मित सभी जीवमात्र , छोटे से छोटे से जीवमात्र से लेकर सबसे बडे प्राणिमात्र मनुष्य तक को व्याप्त करता है 

प्रेम प्रभु तक ले जाने का मार्ग भी बन जाता है।

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

लिखने मे गलती हो तो क्षमाप्राथी🙏🙏

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