भक्ति और ज्ञान…..

भक्ति और ज्ञान……
आत्मज्ञान यानि आत्मा का अनुभव। यह ज्ञान हमें कोटि कोटि जन्मों के पुण्यों के उदय के फलस्वरूप मिलता हैं ।आत्मज्ञान कहीं बाहर बैठा हुआ नहीं है जिसे जाकर पाया जा सके। वह हमारे भीतर ही लबालब भरा पड़ा हैं ।जो सदा हर वस्तु का केवल अच्छा पक्ष देखते हैं वे ही आत्मज्ञान पाने के अधिकारी होते हैं। सब आत्मा ही हैं।सभी आसक्तियों और देहभाव से मुक्त होते हैं तो हमें आत्मा की अनुभूति होती हैं ।और एक गहरी समझ पैदा होती हैं कि आत्मा का कोई जन्म और मृत्यु नहीं होता हैं ,न कोई सुख दुःख होता हैं इससे हमारा मृत्यु भय मिट जायेगा और अनन्त सुख की प्राप्ति होगी ।
  “मैं”के भाव से, पूरी तरह छुटकारा पाना चाहिये। जब “मैं “(अहंकार)का भाव निकल जाता हैं तो आत्मासुख की अनुभूति का भान होने लगता इस तरह हम आध्यात्मिक उन्नति अवश्य प्राप्त करेंगे।

आत्मज्ञान की अवस्था में, हम दूसरों को भी अपनी तरह ही आत्मरूप मानते हैं। इस कारण दूसरों में भी अपनी ही तरह आत्मा का अनुभव करते हुए, उनकी गलतियों को माफ़ कर देते हैं और सब को निर्दोष देखते हैं।

आत्मज्ञानी के लिये, आत्मा से भिन्न कुछ नही है ।आत्मज्ञान पाने के हमें आध्यात्मिक गुरू की अत्यंत आवश्यकता होती हैं उनके बिना आत्मा के उस स्तर तक पहुँचना असंभव होता है ।जिस तरह लहरों के शांत होने पर ही, हम सूर्य का स्पष्ट प्रतिबिंब देख पाते हैं। इसी तरह मन की तरंगों के शांत होने पर ही, हम आत्मा को देख पायेंगे।और हमारी आत्मा स्वतः प्रकट हो जायेगी ।

जब हम अहंकार हटा देते हैं, तभी हम अपनी आत्मा की ध्वनि सुन सकते हैं। पूर्ण समर्पण घटित हो जाने पर ‘मैं’ का भाव शेष नहीं रहता, केवल परमात्मा रहता है। इस अवस्था को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

यदि एक आध्यात्मिक गुरू की शरण लेने के बाद भी तुममें दुख व्याप्त हैं और सुख की अनुभूति नही हो रही हैं तो इसका अर्थ है कि तुम्हारी समर्पण भावना पूर्ण नहीं है ,तुम्हें अपने गुरू पर पूर्ण विश्वास नहीं है। एक बार आध्यात्मिक गुरू की शरण में आने पर, तुम्हारा एक मात्र कार्य उनकी आज्ञा का निष्ठा से पालन करना है,और कोई शंका मन में नही आनी चाहिये। जयसच्चिदानंद🙏🙏

रंगबिरंगे विचार (मेरी कलमससे)

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