जैसा संग वैसा रंग …..

हमारी जिंदगी मे अच्छी संगति भी बहुत मायने रखती हैं।इसलिये बोला जाता है जैसा संग वैसा रंग । 

 यदि इंसान अच्छी संगति मे हमेशा रहेगा तो कितनी भी बड़ी समस्या क्यों ना हो वह आसानी से समस्या से बाहर आ जायेगा क्योकि अच्छी संगति से हमेशा सकारात्मक भाव व हिम्मत आती हैं । आध्यात्मिक जगत की बात करे तो ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जहॉ संगति से हिंसक पशु भी शांत होकर बैठ जाता हैं जैसे कि भगवान महावीर । वह जहॉ भी होते वहॉ से कुछ किलोमीटर दूरी तक उनकी आभा का इतना प्रभाव पड़ता था कि शेर भी अहिंसक हो जाता । उनको सॉप काटे जाने पर रक्त की जगह दूध का निकलना ।ये सभी बाते दर्शाती है कि वह कितने भव्य आत्माये थी ।उनकी संगति तो क्या ,अंतिम समय मे उनकी वाणी सुनते ही कितने लोग मोक्ष गति को प्राप्त हो गये । इसी तरह बौद्ध काल मे अंगुलीमाल की कथा आती हैं ।जो इस प्रकार हैं ….

बौद्ध काल के समय एक अंगुलिमाल नाम का डाकू था जो राजा प्रसेनजित के राज्य श्रावस्ती के सुनसान जंगलों में राहगीरों को मार देता था और उनकी उंगलियों को काटकर उसकी माला बनाकर पहनता था । वही डाकू जो बाद मे भगवान बुद्ध की संगति मे आने से संत बन गया ।  कथा मे बताया गया कि अंगुलीमाल जिस वन मे रहता था एक समय भगवान बुद्ध उसी वन से जाने को उद्यत हुए तो अनेक लौगो तथा श्रमणों ने उन्हें समझाया कि वे अंगुलिमाल जहॉ रहता है उस क्षेत्र में न जायें। अंगुलिमाल का  सबको बहुत ज्यादा भय था । यहॉ तक कि महाराजा प्रसेनजित भी उसको वश में नहीं कर पाए। भगवान बुद्ध मौन धारण कर चलते रहे। कई बार रोकने पर भी वे चलते ही गए। अंगुलिमाल ने दूर से ही भगवान को आते देखा। वह सोचने लगा आश्चर्य है मेरे यहॉ से गुज़रने वाले पचासों आदमी भी मिलकर चलते हैं तो भी मेरे हाथ में पड़ जाते हैं, पर यह श्रमण अकेला ही चला आ रहा है, इसको मेरा कोई भी डर नही ,मानो मेरा तिरस्कार करने ही आ रहा है। क्यों न इसे जान से मार दूँ।’

अंगुलिमाल ढ़ाल-तलवार और तीर-धनुष लेकर भगवान की तरफ दौड़ पड़ा। फिर भी वह उन्हें नहीं पा सका। अंगुलिमाल सोचने लगा ‘आश्चर्य है! मैं दौड़ते हुए हाथी, घोड़े, रथ को पकड़ लेता हूँ, पर मामूली चाल से चलने वाले इस श्रमण को नहीं पकड़ पा रहा हूँ! बात क्या है। वह भगवान बुद्ध से बोला खड़ा रह श्रमण ।इस पर भगवान बोले मैं स्थित हूँ अँगुलिमाल! तू भी स्थित हो जा।’ अंगुलिमाल बोला – ‘श्रमण! चलते हुए भी तू कहता है ‘स्थित हूँ’ और मुझ खड़े हुए को कहता है ‘अस्थित’। भला यह तो बता कि तू कैसे स्थित है और मैं कैसे अस्थित?’
भगवान बुद्ध ने उसे अपनी बातों से बोध कराया ।अंगुलिमाल पर भगवान की वाणी का असर पड़ा। उसने निश्चय किया कि मैं चिरकाल के पापों को छोड़ूँगा । उसनेअपने सारे हथियार फैंक दिये और भगवान के चरणों की वंदना की और उनसे दीक्षा माँगी। ‘आ भिक्षु!’ कहकर भगवान ने उसे दीक्षा दी।

भौतिक जगत से जुड़ी बात करे तो परिवार मे जैसा संग होगा वैसा ही रंग होगा । छोटा बच्चा परिवार का जैसा माहौल होता हैं उसी के अनुसार वह ढलता हैं ।यदि परिवार के बडे सदस्य आपस मे दिन रात लड़ते हो तो बच्चा का भी व्यवहार धीरे धीरे लड़ाई वाला होने लगता हैं । मैने कई जगह मॉ बाप को लड़ते ग़ुस्सा करते हुये देखा है वहॉ पर बच्चे भी बडे होने पर कर्कश स्वभाव के हो जाते है । उसी स्वभाव से चाहे मॉ बाप बाद मे कितने भी परेशान क्यों ना हो बच्चा चेंज नही होता है । इसके विपरीत हो तो बच्चा भी सबसे प्रेमपूर्वक बात करने वाला ,विनम्र होता हैं । 

यदि घर के बड़े लोग क्लबों या देर रात पार्टी मे अधिकतर समय बिताते है तो बच्चे भी अपना अधिकतर समय बाहर दोस्तो के साथ घूमना फिरना मज़े करना आदि बातों मे व्यतीत करता हैं ।स्कूल मे कैसे मित्रों का संग मिलता है यह भी निर्भर करता है ।

 बच्चों को वह माहौल घर या स्कूल से ,कॉलेज या जहॉ ज्यादा समय रहता है व्यतीत करता है जैसा मिलता है ,वह वैसा ही बन जाता है ।

ज़रूरी नही की घर का माहौल ही मायने रखती है ।कभी कभी घर का माहौल अच्छा होने के बावजूद बच्चा ग़लत मित्रों की संगति मे पड़कर बिगड़ जाता है क्योकि कभी कभी बच्चों को मॉ बाप से ज्यादा दोस्तो पर यक़ीन होता है ।

घर के बडे लोग भी जिसके संग ज्यादा बात करते है उठते बैठते है वैसे ही रंग मे रंग जाते है जैसे कि कोई भौतिकवाद होगा या कोई स्पिरिचुअल होगा तो उसी के अनुरूप उसके मित्र होंगे ।

मैने कई जगह मॉ बाप को लड़ते ग़ुस्सा करते हुये देखा है वहॉ पर बच्चे भी बडे होने पर कर्कश स्वभाव के हो जाते है उसी स्वभाव से चाहे मॉ बाप बाद मे कितने भी परेशान क्यों ना हो बच्चा चेंज नही होता है ।

संगति को एक लघु कथा से भी समझ सकते हैं

एक राजा था ।उसे तोता पालने का बहुत शोक था । एक दिन राजा का तोता मर गया। उन्होंने मंत्री से कहा 

मंत्रीवर । हमारा तोता मरने से पिंजरा सूना हो गया। अभी के अभी एक नया तोता लाओ। बेचारा मंत्री रात दिन तोता लाने के लिये इधर उधर चक्कर लगाने लगा ।मंत्री एक संत के पास गया और कहा “हे महात्मा “राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी। संत ने कहा ,ठीक है, ले जाओ।राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख सुविधा का प्रबन्ध किया। ब्रह्ममुहूर्त में तोता बोलने लगा -ओम् शांति ,ओम शान्ति ।राजा महारानी उठो भोर हो गई हैं ।दुर्लभ मानव शरीर मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है।रोज तोते के मुँह से ये शब्द निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि तोता क्या मिला, एक संत मिल गये।

हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह तोता भी मर गया। राजा, रानी,राजपरिवार और पूरे नगर मे हफ़्तों शोक मनाया और बाद मे राजकाज में लग गये। एक दिन पुनः राजा साहब ने कहा मंत्रीवर! खाली पिंजरा सूना-सूना लगता है, एक तोते की व्यवस्था करो ।

मंत्री ने इधर-उधर फिर तोते की तलाश करना चालू कर दिया ।एक दिन उन्होंने देखा, एक कसाई के यहाँ वैसा ही तोता एक पिंजरे में बैठा था। मंत्री ने कहा कि इसे राजा साहब चाहते हैं। कसाई ने कहा कि किसी बहेलिये ने एक वृक्ष से दो तोते पकड़े थे। एक को उसने महात्माजी को दे दिया था और दूसरा मैंने खरीद लिया था। राजा को चाहिये तो आप ले जाये ।

अब कसाईवाला तोता राजा के पिंजरे में पहुँच गया। राजपरिवार बहुत प्रसन्न हुआ। सबको लगा कि वही तोता जीवित होकर चला आया है।दोनों की नासिका, पंख, आकार, चितवन सब एक जैसे थे। लेकिन बड़े सवेरे तोता उसी प्रकार राजा को बुलाने लगा जैसे वह कसाई अपने नौकरों को उठाता था कि उठ! हरामी के बच्चे! राजा बन बैठा है। मेरे लिए ला अण्डे, नहीं तो पड़ेंगे डण्डे! राजा को इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और गर्दन मरोड़कर किलेसे बाहर फेंक दिया।दोनों तोते सगे भाई थे। एक की गर्दन मरोड़ दी गयी, तो दूसरे के लिए झण्डे झुक गये, भण्डारा किया गया, शोक मनाया गया। 

आखिर भूल कहाँ हो गयी? अन्तर था तो संगति का! सत्संग की कमी थी।

दोस्तों ! यह कहानी हमे सिखाती है की किस तरह से संगति हमारे जीवन को प्रभावित कर सकती है कोई भी आदमी संगति के कारण सुधर या बिगड़ सकता है ।हमारी संगति कैसी है यह हमें जरुर देखना चाहिए और हमारे दोस्त सही है या गलत इस बात का हमें विश्लेषण करना चाहिए ।दोस्त तो हम सभी के होते है लेकिन क्या वे दोस्त सही भी है,क्या कही वे हमें बुरी आदतों में या बुरे कामो में शामिल तो नहीं कर रहे ।

दोस्त सुख-दुःख में हमेशा साथ होते है और हमारे किसी भी बुरे काम पर हमारी आलोचना करेंगे और कभी भी हमे बुरे आदतों में नहीं डालेंगे तो अब फैसला आप कीजिये की आपकी संगति कैसी है।

जैसे कि मंथरा की संगति ने कैकेयी को हमेशा के लिए बदनाम कर दिया. सज्जनों और सद्ग्रंथों की संगति के कारण विभीषण का उद्धार हो गया. हम जैसे लोगों के साथ अपना समय बिताते हैं, हमारी वैसी हीं गति होती है.

 जैसी संगति……..वैसी गति

अच्छी संगति से विचारो की भी शुद्धि हो जाती है ।जो कोई इंसान ज्ञानी पुरूष या महात्मा या संत या मुनियों या कोई भी महान शख़्सियत की संगति मे रहा है उसके जीवन का उद्धार होना निश्चित हैं । 

लिखने मे कोई गलती हो तो क्षमायाचना🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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