मानव धर्म ….निस्वार्थता …..

मनुष्य जीवन सृष्टि की सर्वोपरि कलाकृति हैं । यदि मनुष्य मे मानव धर्म की भावना आ जाती है तो वह अपना जीवन सार्थक कर लेता हैं ।
 मानव धर्म के मूल आधार हैं -दान, दया, तप, सत्यता,क्षमा निस्वार्थता ,करूणा…इत्यादि। धर्म के नियमों पर चलने के उपरांत मनुष्य का हृदय निर्मल हो जाता है तब उस स्थिति में करुणा जन्म लेती है। करुणा के कारण दया व क्षमा का भाव उत्पन्न होता है।इससे मानवधर्म की भावना आती हैं ।
स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि सच्ची ईश्वर की उपासना वह हैं जिसमें हम अपने को मानव-बन्धुओं की सेवा में लगा दें। जब कोई आदमी भूखा मिले तब मन्दिर में भोग चढ़ाने की बजाय उसका पेट भरना मानवता है। जब मनुष्य दुर्बल और क्षीण हो, तब उसकी परवाह करना मानवता हैं । 
मानव धर्म वह व्यवहार है,जो जगत में परस्पर एकता ,प्रेम, सहानुभूति, करूणा के साथ एक दूसरे की मदद करना ,ध्यान रखना ….आदि सीखा कर हमें उच्च आदर्शो की ओर ले जाता है।मानव धर्म से जुड़ा एक दृष्टान्त लेते हैं …..
एक सेठ ने नगर में एक मंदिर बनवाया । उसे उस मंदिर की देख-रेख के लिए किसी योग्य व्यक्ति की तलाश थी। उसने नगर भर में योग्य आदमी की तलाश शुरू कर दी। एक से बढ़ कर व्यक्ति मंदिर की देख-रेख के लिए सेठ के पास आने लगे। पर सेठ को कोई पंसद नहीं आता। मंदिर में भक्तों का आना-जाना शुरू हो चुका था। 
एक सुबह एक आदमी फटेहाल स्थिती मे नंगे पांव मंदिर में भगवान के दर्शन करने पहुंचा। वो जब दर्शन करके मंदिर से लौट रहा था, तभी सेठ वहां पहुंच गया और उसने उस आदमी से हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि क्या आप मंदिर की देखभाल का काम अपने ऊपर लेना चाहेंगे? 
आदमी हैरान था। उसने कहा कि सेठ जी, मैं तो अनपढ़ हूं। बहुत गरीब हूं। आपके पास तो इतने सारे अच्छे लोग हैं, पढ़े-लिखे लोग हैं, आप उन्हें छोड़ कर मुझे क्यों मंदिर की ज़िम्मेदारी सौंपना चाहते हैं? 
सेठ जी मुस्कुराने लगे। उन्होंने उस आदमी से कहा कि मैं मंदिर की छत से रोज़ लोगों को आते-जाते देखता हूं। मैने मंदिर के मार्ग में एक नुकीला पत्थर जानबूझ कर लगवा रखा था। कई लोग आते, उससे बच कर निकल जाते। कई लोग आते, उन्हें उससे चोट भी लगती। वो पत्थर की ओर गुस्से से देखते, फिर मंदिर पहुंच जाते। पर आप पहले आदमी हो, जिसने पत्थर को देख कर फावड़ा मांग कर राह से निकाल फेंका। आपको चोट भी नहीं लगी थी, लेकिन आपने उस पत्थर को इसलिए निकलवा दिया, ताकि किसी को भी चोट न लगे। 
इस मंदिर में जितने भी लोग आते हैं, वो भगवान से अपने लिए कुछ न कुछ मांगने आते हैं। अपने लिए सोचने वाले आते हैं। उन्हें मैं मंदिर की ज़िम्मेदारी कैसे सौंप सकता हूं। पर आप पहले ऐसे आदमी मिले, जिसने उस पत्थर को हटाया वह भी दूसरों के लिए। जो दूसरों के लिए सोचता है, वही मानव धर्म का पालन कर सकता है। 
जो लोग सिर्फ अपने लिए सोचते हैं, उनका जीवन निरर्थक होता है। जो दूसरों के लिए सोचता है, जो राह में पड़े उन पत्थरों को हटाता हैं जिनसे किसी को चोट लग सकती है यानि कि दूसरे के दुख दर्द को महसूस करता हो । वही असली ज्ञानी है। 
लिखने मे कोई गलती हो गई हो तो क्षमाप्रार्थी🙏🙏
जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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