दिल को छू लेने वाला यात्रा का एक सुखद अनुभव ….

दिल को छू लेने वाला यात्रा का एक सुखद अनुभव ….कुछ साल पहले की बात हैं । मैं मुंबई से दिल्ली अपने पति के साथ ट्रेन मे यात्रा कर रही थी । वहॉ मुझे वृद्ध दंपति मिले । अंदाजन अंकल की उम्र करीबन 82साल के आसपास होगी और आंटी की उम्र करीबन 80 साल की होगी। यदि उम्र की गणना छोड़ दें, तो दोनों चुस्त दुरुस्त यानि फिट लग रहे थे।हमारी सीट के पास दोनो बैठे थे ।ट्रेन चलते ही आंटी ने घर की बनी कुछ खाने की वस्तुये निकाली । शायद दोनो को काफी भूख लग रही थी ।आंटी ने अंकल व हम दोनो को खाने के लिये कुछ स्नेकस दिये । हमने उनका मान रखने के लिये थोड़ा सा ले लिया ।अंकलजी भी कांपते हाथों से धीरे-धीरे खाने लगे।

थोडी देर बाद आपस मे एक दूसरे बातचीत करने लगे । धीरे धीरे दोपहर होने लगी । आंटी ने भोजन सर्व करना शुरू किया मैने भी अपना खाने का सामान निकाल लिया । हम चारों एक साथ भोजन का आनंद लेने लगे । जब भोजन कर चुके तो हम सभी सुस्ताने लगे । 

शाम को एक रेल्वे प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ी रूकी वहॉ मेरे पति कॉफ़ी ,चाय ,पानी या कॉल्ड ड्रिंक जो भी पसंद हो उसके अनुसार पीने के लिये पेय लेकर आये ।हमने कॉल्ड ड्रिंक पीने के लिये बोतल के ढक्कन को खोला और धीरे-धीरे पीने लगे । अंकल व आंटी को सिर्फ़ बिसलेरी पानी चाहिये था । पानी पीने के लिये अंकलजी ने बोतल के ढक्कन को खोलना शुरू किया लेकिन ढक्कन खुल नही रहा था ।

अंकलजी कांपते हाथों से उसे लगातार खोलने की कोशिश कर रहे थे। मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें मुश्किल आ रही है इसलिये मदद के हिसाब से मैने अंकल को कहा कि अंकलजी !!बोतल दीजिये मैं खोल देती हूं।अंकलजी ने मेरी ओर देखा, फिर मुस्कुराते हुए बोले कि बेटी ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा।मैंने कारण पूछा नहीं,लेकिन प्रश्नभरी निगाहों से उनकी ओर देखने लगी । यह देख, अंकलजी ने आगे कहा देखो बेटी आज तो तुम खोल दोगी लेकिन अगली बार कौन खोलेगा ? इसलिए मुझे खुद को मालूम होना चाहिए कि ये कैसे खुलता है । आंटी भी अंकल की बात से सहमत थीं।

पानी की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था। पर अंकलजी अभी भी खोलने की कोशिश कर रहे थे और बहुत बार कोशिश कर के आखिरकार उन्होने ढक्कन खोल ही दिया।अब दोनों आराम से पानी पीने लग गये ।

 मुझे मुंबई से दिल्ली की रेल यात्रा के दौरान अंकल आंटी से जिंदगी के विषय मे एक नया अनुभव सीखने को मिला जो आप सबसे शेयर करना चाहूँगी…..

 अंकलजी ने मुझे बताया कि उन्होंने जिंदगी मे कुछ नियम बना रखे थे जैसे कि अपना हर काम वो खुद करेंगे।हालाँकि उनके घर में बच्चे हैं,भरा पूरा परिवार है।सभी साथ रहते हैं। पर अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरत के लिये वे सिर्फ आंटी की ही मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं।उनका आपस मे इतना प्रेमभाव है कि वो दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हैं। 

 वह कह रहे थे कि यदि मैं एक बार भी काम करना छोड़ दूँ तो दूसरों पर निर्भर हो जाऊँगा फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं,वो काम उससे । इस तरह से बेटा समझ लो कि मै धीरे धीरे बिस्तर पर ही पड़ जाऊंगा।फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा।अभी तो सिर्फ चलने में पांव कांपते हैं, खाने में हाथ कांपते हैं बाकी और तकलीफ़ नही है ।

अंकलजी ने मुझसे कहा कि बेटी जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए।जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए।

बातों ही बातो मे बताया कि वो दोनो दिल्ली मे कुछ दिन रहेंगे खायेंगे पियेंगे और घूमेंगे ।

अंकलजी बताने लगे कि हम इसी तरह महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं। बेटे-बहू कहते हैं कि अकेले जाने मे मुश्किल होगी,पर हम दोनो तो मन मे जानते है कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना-फिरना बंद करके खुद को घर तक ही सीमित कर देंगे ।

पूरी ज़िंदगी खूब काम किया। अब मैने दोनो के लिये पैसे बचाकर बाकी सब बेटों को दे दिये । अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और उसी पैसो से हम दोनों आराम से घूमते हैं।जहां जाना होता है एजेंट के द्वारा टिकट बुक करा देते हैं। फोन करने पर घर तक टैक्सी आ जाती है। वापिसी में भी टैक्सी आ जाती है।अच्छी होटल लेने से कोई तकलीफ नही होती है।सेहत उम्र के अनुसार एकदम ठीक है।फिर हँसकर बोलते है कि बस कभी-कभी पानी की बोतल का ढक्कन ही नहीं खुलता पर वह भी थोड़ा दम लगाओ,तो खुल ही जाता है।
ये सब बाते सुनकर मै एकदम से अवाक् हो गई।हमेशा यात्रा के दौरान टाईमपास करने के लिये अच्छी पुस्तके रखती थी पर यहां तो मैंने अंकल आंटी से जिंदगी जीने के विषय मे तथा आत्मनिर्भरता की पूरी पुस्तक ही पढ डाली।

एक ऐसी पुस्तक जिसमें जीवन जीने के साथ आत्मनिर्भरता का भी संदेश छुपा हो ।

यानि की अपना काम जहाँ तक संभव हो स्वयं ही करो ।


लिखने मे गलती हो तो क्षमाप्रार्थी🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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