अभ्यास से जीवन परिवर्तन….

मनुष्य अपनी पूरी जिंदगी भौतिक जगत या आध्यात्मिक जगत या दोनो मे व्यतीत करता है ।जो मार्ग पसंद हो वह अपनाता है तथा उस पर कार्य करता हैं ।परिस्थिति के अनुसार कोई कार्य कभी कभी किया जाता है तो कोई कार्य रोज़  किया जाता है । जब हम कोई काम बार-बार करते अथवा दोहराते हैं, तो वह काम न केवल हमारे लिए सरल हो जाता है, बल्कि हमारी कार्य करने की क्षमता में भी वृद्धि करता है। 

निजी जिंदगी की बात करे तो ऐसे कितने ही उदाहरण हमे रोज़ की दिनचर्या मे देखने को मिलेंगे जिन्हें करने के लिये हमे सोचने की भी ज़रूरत नही पडती है जैसे कि ब्रश करना ,नहाना,पूजा पाठ करना,बच्चो को स्कूल ,भोजन करना ,घर के कार्य,ऑफ़िस जाना …इत्यादि ।ये सब काम रोज़ के अभ्यास के कारण आसानी से हो जाते है 

इसी तरह मॉ का उदाहरण ले जिसमें दुबली पतली मॉ अपने गोलमटोल बच्चे को भी बडे आराम से उठाकर चल लेती हैं कारण कि जन्म से ही बच्चे को गोदी मे उठाने का अभ्यास होता है ।वही बच्चा जब चलना प्रारम्भ करता है तो शुरू शुरू मे बार बार गिरता है लेकिन रोज़ के अभ्यास से एक दिन वही बच्चा आराम से चल सकता है ।

इसी तरह खाना पकाने का अभ्यास होने से खाना बिना सोचे ही जल्दी से पकाया जा सकता है ।ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जायेंगे जहॉ कोई कार्य अभ्यास के कारण जल्दी से यंत्रवत तरीक़े से पूरे हो जाते हैं ।

क्षैत्र चाहे कोई सा भी हो -कॉमर्शियल,प्रोफेशनल हो(जैसे इंजीनियर,डॉ,वकील,चार्टेड,…)या बिसनेस ,सभी मे पहले कार्य से सम्बंधित अभ्यास किया जाता है ।बाद मे उसमे सफलता हासिल होती है ।अभ्यास होने के बाद क्या स्थिती होती है वह इस कहानी से समझ सकते है 

एक स्त्री और उसका पति सर्कस में काम करते थे। स्त्री स्टेज पर अपने सिर पर सेब रखकर एक जगह खड़ी हो जाती और पति आराम से ऑखो पर काली पट्टी बाँधकर बिना देखे सेब पर निशाना दागता और सेब के टुकड़े कर डालता ।उसके हर तीर के साथ तालियाँ बजती थी। एक दिन पति पत्नी में तकरार हो गई। पति को इतना गुस्सा आया कि उसने सर्कस के खेल में उसे मारने का मन बना लिया। रोज़ की तरह आँखों पर काला कपड़ा बाँधकर खेल शुरू किया गया । पति ने पत्नी को मारने के उद्देश्य से उस पर तीर छोडा । पर यह क्या ,फिर तालियों की गडगड़ाहट । उसने कपड़ा हटाकर आँखे खोली तो हैरान रह गया। तीर पहले की तरह ही स्त्री के सिर पर रखे सेब को टुकड़े करता हुआ आगे निकल गया । कारण की उसको ऐसा अभ्यास हो चुका था कि वह चाहकर भी गलत तीर का निशाना साध न सका। 

इसी प्रकार जब हमे सकारात्मक बाते सोचने का अभ्यास हो जाता है तो मन अपने आप ही सब पॉज़िटिव बाते सोचता हैं । यदि हम अपने आप को “ईश्वर ,गुरू,ज्ञानी पुरूष या संत महात्मा” जिसको भी मानते है उनको पूर्ण रूप से समर्पित कर दे और उनकी कही बातो पर अमल करने का अभ्यास शुरू कर दे तो तो धीरे धीरे उनके गुण हमारे भीतर प्रकट होने लगते है यहॉ तक कि परमात्मा की परम दशा को भी पा सकते है ।

इसी तरह सुबह उठते ही यदि हम सबसे पहले ईश्वर को याद करने की आदत डाले तो थोड़े दिन तो हमे याद रखना पड़ता है लेकिन अभ्यास होने पर हमे उठते ही ऑटोमेटिक भगवान का नाम मुँह पर आने लगेगा ।

ये बात सिर्फ सुनने से पक्की नही हो जाती है कि हम आत्माये हैं जो सुख ,शांति ,प्रेम ,आनन्द ,पवित्र ,शक्ति और ज्ञान स्वरूप हैं तथा शरीर से अलग है । हम इस धरती पर एक नाटक के किरदार की तरह नाटक करने आये है ऐसा सोचने पर हमे दुख का अनुभव नही होगा ……ये सब सुनने से नही बल्कि इसके लिए बार – बार अभ्यास करना पड़ेगा और यह अभ्यास का काम हमारे सद्गुरु कराते हैं जैसे कि अपने को आत्मा समझो ,अपने स्वरूप को जानो ।पुण्य और पाप कर्म क्या होते है….से सब बातें समझने के लिए आत्मा का अभ्यास पक्का होना चाहिए और ये अभ्यास ही हमे मोक्ष मार्ग मे आगे बढने के लिये सहायता करता हैं ।

करते रहो निरंतर चाहे किसी का भी अभ्यास 

किसी दिन हो जायेंगे मार्ग एकदम आसान 

और  पायेंगे सपने पूर्ण साकारलिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदांनद🙏🙏

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