मधुर स्वभाव का परिणाम…..

यदि व्यक्ति आपस मे एक दूसरे के साथ नम्रता, सद्भावना के साथ प्रसन्नता व्यक्त करते हुये बात करे तो व्यक्ति को एक अलग ही खुशी का अनुभव होता है । हम जितना मधुर व्यवहार दूसरे के प्रति रखेंगे उतना ही वह हमे सुख का अनुभव होगा।

यदि हम दूसरे के साथ मधुर वाणी मे बात करेंगे तो वे लोग भी हमसे उतने ही अच्छे तरीक़े से पेश आयेंगे । यह संसार कुएँ की आवाज की तरह प्रतिध्वनि करता है। जैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ करते हैं, लगभग उसी स्तर की प्रतिक्रिया उनसे हमें प्राप्त होती है।जैसे कि यदि हम कुएँ मे तेज आवाज़ से बोले कि “तु चोर है तु चोर है “तो वापिस “तु चोर है तु चोर है “इसकी प्रतिध्वनि आयेगी ।

मिठास होने से कितना भी क्रोधित हुआ इंसान नरम पड़ जाता हैं ।ये इस कहानी के माध्यम से जान सकते है …

एक राजा था जिसका नाम प्रसन्नजित था । एक रात उसने सपना देखा। सपने में कोई उसे भला मानस कह रहा था कि, बेटा! कल रात तुम्हें एक सर्प काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प तुम्हारे राजमहल से थोड़ी दूर एक पीपल पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुम्हारे पूर्व जन्म का बैरी है ,उसकी शत्रुता का बदला लेना चाहता है।
सुबह हुई। राजा सोकर उठा। और सपने की बात को लेकर चिन्तित हो गया ।अपनी सुरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? इसे लेकर विचार करने लगा। कई तरह के विचार आये जैसे कि सर्प को मरवा दिया जाये या ऐसा पहरा कर दिया जाये कि चींटी भी ना घुस सके लेकिन इन उपायों से संतुष्टि का अनुभव नही हो रहा था ।

सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई ताक़तवर हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है उसी से सर्प को जीतूँगॉ। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया।

शाम होते ही राजा ने उस पीपल पेड़ की जड़ से लेकर अपने पलंग तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जल ,इत्र आदि का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवको व पहरेदारो से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने का या हानि पहुचॉने की कोशिश न करें।

रात को सांप अपनी बॉबी में से बाहर निकला और राजा को मारने के इरादे से राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देखकर आनन्दित होता गया। कोमल फूलो के बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का आनंद लेता हुआ तथा जगह-जगह पर रखा मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता गया ।

इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और नाराज़गी के स्थान पर प्रसन्नता के भाव बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि पहरेदार और द्वारपाल के साथ खूब सारे सेवक सशस्त्र खड़े तो हैं, परन्तु उन सभी ने उसको जरा भी हानि पहुंचाने की कोशिश नही की ।

मन को हरने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसके विचारो को परिवर्तित कर दिया । सोचने लगा कि कहॉ वो जो राजा को काटने चला था और एक ये राजा जो उसका इतना ख़्याल रख रहा है । अब उसके लिए काटने का कार्य असंभव हो गया ।सोचा जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को मैं कैसे काट सकता हूँ । काटूँ या ना कॉटू ?  यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पड़ गया।

राजा के पलंग तक जाते जाते सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे मधुर और सद्व्यवहार ने मुझे हरा दिया । अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप तुम्हें अपनी बहुमूल्य मणि दे रहा हूं। इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया।

यह महज कहानी नहीं हमारे जीवन की सच्चाई है। अच्छा व मधुर व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बनाने की ताकत तो रखता ही है साथ मे विपरीत स्थितीयो को भी अनुकूल बनाने की क्षमता रखता है । यदि व्यक्ति व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है । अपने मधुर व्यवहार से हरेक का मन मोह लेता है ।

छोटे बच्चे को भी वाणी की मिठास से,कैसा भो हो,उसके व्यवहार मे परिवर्तन ला सकते है । एक घटना याद आती है हमारी पड़ोस वाली आंटी हमेशा अपने बच्चो को सवेरे जल्दी उठाने के लिये लिये कर्ठोर भाषा का इस्तेमाल करती थी । उसके बच्चे कठोर वाणी सुन सुनकर ढीठ बन गये । बच्चे कभी भी अपनी मॉ का कहना मानना तो दूर बल्कि उसके साथ बातचीत मे भी आदर का भाव नही रखते । इस कारण ऑटी बहुत दुखी रहती । एक बार ऑटी ने किसी संत को अपने बच्चो के व्यवहार के विषय मे ज़िक्र किया और सुधारने के लिये समाधान मॉगा । संत ने समझाया और कहा कि अब आप बच्चो को सवेरे उठाने मे या कोई और कार्य करवाने के लिये जैसा उनके साथ व्यवहार करती आ रही है उसके ठीक विपरीत व्यवहार कीजिये । ऑटी बड़ी मुश्किल से ऐसा करने के लिये राज़ी हुई । अब वह कोई भी कार्य करने के लिये बच्चो को प्यार से एक बार ही कहती उसके बाद मे उस काम का ज़िक्र ही नही करती  । सवेरे उठाना तो दूर बल्कि रूम का अंधेरा करके और अच्छी तरह से चादर ओढ़ा कर दरवाज़ा बंद कर देती और बोलती कि बच्चो अब आराम से सोते रहो ,तुम्हें कोई भी डिस्टर्ब्ड नही करेगा । बच्चे हैरान हो गये कि मॉ को एकाएक क्या हो गया । कुछ दिनो बाद बच्चो को ख़ुद पर शर्म महसूस होने लगी और धीरे धीरे मॉ के बिना बोले अपने आप से सवेरे जल्दी उठने लगे तथा साथ मे और भी बात का कहना एक बार मे ही मानने लगे । 

तो देखा आपने वाणी की मधुरता जीवन का आनंद है। उसकी मिठास से हर किसी का दिल जीता जा सकता है। 

 यदि हमारा लोगो के साथ बोलने मे कठोर या तंतीली भाषा का प्रयोग ना चाहते हुये भी हो जाता है तो रोज ईश्वर से सभी के साथ मृदु (मधुर) ऋजु वाणी बोले ,इसके लिये शक्ति मॉगनी चाहिये । 

लिखने मे गलती हो तो क्षमाप्रार्थी🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

3 Comments Add yours

  1. प्रेम स्नेह पाकर कोई भी स्वयं को अभिभूत समझता है, कोई बालक या जीव जन्तु हमारी भाषा भले ही नही समझे किन्तु हमारे भाव और प्रेम से जरूर प्रभावित होते हैं। निश्छल मन औऱ प्रेम है तो जीवन से कोई शिकायत नही🙏🙏

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      1. जी धन्यवाद🌻

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