अंतिम घड़ी काम ना या ये पैसा….

ये बात ठीक है कि पैसा अच्छा जीवन जीने के लिए ज़रूरी है। लेकिन पैसा कभी भी खुशियों का आधार नहीं हो सकता। 
पैसा हमें सिर्फ थोड़ी देर के लिए ही ख़ुशी देता है ,जैसे कि हमे कोई वस्तु चाहिये और वह ख़रीदते है तब तक बहुत खुशी मिलती है लेकिन उस वस्तु के मिलने के बाद मे फिर दूसरी वस्तु को लेने की इच्छा होती है तो पहली वाली खुशी चली जाती है ।
जो लोग पैसे के पीछे भागते हैं वो तर्क देते हैं कि पैसे से दुनिया की हर खुशी खरीदी जा सकती है। एक बहुत बड़े रिसर्च में ये दावा किया गया है कि एक व्यक्ति की असीमित खुशी के लिए “प्रेम और अच्छे कर्म”पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। 
भगवद गीता में भी श्री कृष्ण ने कहा है कि मुझे जीतने का एक ही तरीका है और वो है प्रेम। मुझे प्रेम कीजिए और मैं सहर्ष आपका हो जाऊंगा यानि प्रेम की ताकत के ज़रिए दुनिया में किसी को भी जीता जा सकता हैं ।

चाहे हमारे पास कितना भी पैसा हो लेकिन अंत समय मे पैसे का खाता काम न आकर पूरी जिंदगी मे किये गये धर्म व कर्म व साथ मे सभी जीवों से किया गया निस्वार्थ प्रेम का खाता काम आयेगा । इसी के सन्दर्भ मे ये कहानी पढिये……

अंतिम घड़ी काम ना या ये पैसा…

बेशुमार पैसे वाला एक रईस इंसान जिसका नाम मनीराम था उसने सही,गलत दोनो तरीक़े से कमाई कर करके इतनी दौलत इकट्ठा कर ली कि आने वाली सात पीढ़ियॉ भी बिना कमाये घर बैठे खा सके । 

उसके पास एक से एक भौतिक वस्तुयें ,देश विदेश की गाड़िये जगह जगह आलीशान बंगले,हर काम के लिये नौकर चाकर व बैंक बैलेंस इतना कि उसे स्वयं भी मालूम नही कि कितना है 

परिवार मे मॉ-पिता,छोटा भाई व बहन तथा खूबसूरत बीवी , इकलौता बेटा सभी साथ मे मिलजुल कर रहते थे । मनीराम ने कभी भी पैसा धार्मिक कार्यों या दान मे या किसी की मदद के लिये खर्च नही किया । पैसे सात्विक कार्यों की जगह मौज मस्ती वाले तामसिक कार्यों मे खर्च किये गये ।

उम्र बढ़ने के साथ धीरे धीरे शरीर पर बुढ़ापा झलकने लगा । अनगिनत बीमारियों ने डेरा डाल दिया । उसने वसीयत बनवाई और अपने बेटे को वसीयत देते हुए कहा, “बेटा मेरे मरने के बाद मेरे हाथो मे मेरा ये फेवरेट रूमाल जो बचपन से संभाल कर रखा है कलाई पर जरूर बॉध देना । ये अंतिम इच्छा जरूर पूरी करना । 

कुछ दिनो बाद पिता की मृत्यु हो गई ।पिता के मरते ही नहलाने के बाद बेटे ने पंडितजी को पिता की अंतिम इच्छा बताई । पंडितजी बोले कि देखो बेटा हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने या बाँधने की इज़ाज़त नही है,पर बेटे की ज़िद थी कि पिताजी की आखिरी इच्छा पूरी हो । दोनो मे इतनी झड़प बढ़ गई की फैसले के लिये शहर के बाकी नामी पंडितों को बुलाया गया,लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला । इसी समय एक नजदीकी परिचित आया और आकर बेटे के हाथ में पिताजी का लिखा हुआ पत्र दिया जिस में पिता ने प्रियजनो के नाम एक संदेश लिखा था …

मेरे सभी प्रियजनो,

देख रहे हो ना  !! दौलत, आलीशान बंगले ,देश विदेश की गाडियॉ और बडे बडे कारखाने…इतना सब कुछ होने पर भी मैं मरने के बाद एक रूमाल तक साथ मे नहीं ले जा पा रहा हूँ । एक रोज़ तुम सबको भी मौत आएगी, अभी से सचेत हो जाओ,तुम्हें भी एक कफ़न में ही जाना पड़ेगा । कोशिश करना कि पैसों के लिए किसी को दुःख मत देना, ग़लत तरीक़े से पैसा ना कमाना  पैसे को अच्छे कार्यों मे ख़र्च करना । अपनी मौज मस्ती के लिये कभी भी तामसिक कार्य मत करना । पैसो से ज्यादा से ज्यादा लोगो की सहायता करना । गुप्त दान करने से कभी भी पीछे मत हटना ।

मेरे प्रियजनो !! मृत्यु के कुछ दिनो पूर्व बिस्तर पर मैने कुछ अच्छे विचारो वाली धार्मिक किताबें पढ़ी और महसूस किया कि पैसो से तो सिर्फ़ अस्थायी विनाशी सुख मिलता है । मैं अपनी बीमार काया को भी पैसो के बल पर निरोगी नही कर पाया । यदि शाश्वत यानि स्थायी सुख चाहिये तो उसके लिये ज़रूरी है “ईश्वर”से जुड़ना जिसकी बदौलत सच्चा सुख “आत्मा का सुख “चखा जा सकता है । शाश्वत सुख की प्राप्ति का रास्ता गुरू या ज्ञानी पुरूष या कोई और जिस पर भी आस्था हो उसके माध्यम से पा सकते हो । इस सुख की प्राप्ति हम अपने फर्ज व कर्तव्य का पालन करते हुये भी कर सकते है । देखो ना अब चाहते हुये भी इन सब बातो के लिये मेरे पास समय नही बचा है पर तुम सब अभी से जाग जाओ ……तुम्हारा अपना

इस कहानी को बताने का तात्पर्य यह है कि”चाहे जो कुछ भी हो “हम इस बात को नही झुठला सकते कि आखिरी क्षण मे मृत्यु के साथ व मृत्यु के बाद सिर्फ जिंदगी भर किये गये अच्छे या बुरे कर्म ही जाएंगे ।

लिखने मे गलती हो तो क्षमाप्रार्थी🙏🙏
जय सच्चिदानंद 🙏🙏 

2 Comments Add yours

  1. कहानी के माध्यम से सच को उजागर किया है। बहुत ही अच्छा लेख है।

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    1. धन्यवाद आपने पसंद किया

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