पुरानी यादे …बोर्ड रिज़ल्ट की 

अभी तो बॉर्ड परीक्षाओं के रिज़ल्ट का मौसम चल रहा है । रिज़ल्ट क्या हो गया दिल की धड़कन हो गई । हर साल के “टॉपर बच्चे”बच्चो से ज्यादा हमें हीन भावना दे जाते हैं ।इस साल टॉपर 99.96 %…अब बताओ ये क्या बात हुई । नंबर ले रहे हो या नंबर को लूट रहे है ?

हमारे समय मे अगर फर्स्ट डिवीजन से पास हो जाए तो मोहल्ले भर में मिठाई बॉटी जाती थी । 60% के ऊपर का हर बच्चा पढ़ाकू की श्रेणी में मे आ जाता था । किसी को भी न कोई हीन भावना , ना ही कोई कॉम्पिटिशन ।

सैकंड डिवीज़न वाला भी अच्छी श्रेणी मे आता था । उसमें भी गुड सेकण्ड डिविजन का ऑप्शन था । गुड सेकण्ड वाला खुद को फर्स्ट वाले से जरा ही नीचे समझता था । जितना की एन.आई.टी वाला आई.आई.टी. वाले से समझता है ।

 अगर किसी का थोड़े बहुत नंबर से फर्स्ट डिवीजन रुक भी जाता तो बिना मार्कशीट देखे पूरा परिवार नंबर कहॉ कटे उसका कारण खोजने लगता व उसके लिये तरह तरह के अंदाज़ लगाये जाते । यदि कुछ समझ नही आता तो अंत मे प्रैक्टिकल सब्जेक्ट वाले टीचर पर ही आरोप मढ देते और बोलते कि हमारे बच्चे से टीचर जरा चिढ़ता था ,पसंद नही करता ,इसलिये नंबर कम दिये है और हमारा बच्चा फ़र्स्ट क्लास आते आते रूक गया ।

रिजल्ट का दिन मातम या त्यौहार से कम नही होता था ।पास होने पर किसी घर मे खुशियों की खिलखिलाहट सुनाई देती थी और प्रसादी के रूप मे लड्डू मिलता तो फेल होने पर रोने की आवाज़ सुनाई देती थी और साथ मे दे दनादन चप्पल की प्रसादी मिलती थी ।
मोहल्ले में ऐसे ऐसे ढीठ बच्चे हुआ करते थे कि पूछो नही तो ज्यादा अच्छा है । घर में घुसते ही रिजल्ट की बजाय पहले से ही गाल आगे कर देते थे । ऐसा देखकर पिताजी भी समझ जाते थे कि रिजल्ट क्या रहा । मन मसोस कर साल भर वो अपनी जिम्मेदारी बुझे मन से निभाते रहते । 

कभी कभार लडके की धुलाई हो तो ठीक है लेकिन हर साल रिज़ल्ट आने पर कपडे की तरह धुलाई करने से इंसान कभी न कभी तो थक ही जाएगा ? इस तरह के लड़के जब बारहवीं क्लास मे बार बार फेल होने के बाद अंत मे थर्ड डिविजन से पास होकर घर में घुसते तो बाकायदा उसका ऐसा स्वागत किया जाता जैसे कि कोई मैडल जीता हो । कुंकंम लगाकर अभिषेक किया जाता व मम्मी सजे हुये थाल से आरती उतारती आखिरकार पास जो हो गया उनका राजा बेटा । पापा खुशी से उपहार मे घड़ी देते तो साथ के यार दोस्त बधाईयॉ !! जिनमें से कुछ की शादी भी हो चुकी होती ,वो अपने बच्चों से बुलवाते कि बेटे अंकल को कॉन्ग्रेटस बोलो । कुल मिलाकर माहौल ही अलग मजेदार होता था ।

रिजल्ट वाले अखबार की कम प्रतियां आती थी ।जिस न्यूज एजेंसी वाले के पास होती थी वो ऐसे जताते कि  मानों वो कोई टॉप पर्सनल्टी हो ….

न्यूज़ वाले इकट्ठी भीड़ को संबोधित करते ….

सब लाइन में खड़े हो जाओ ….

अरे धक्का मुक्की मत करो ….

ओये एक एक करके आओ…
सभी पैसे छुट्टे लाना ….

नही है तो बाद में आना….

अबे एक बार में एक का ही बताऊंगा….. 
अच्छा मेरी बहन का ही बता दे प्लीज……

लड़कियों के रिजल्ट देखने उनके सगे भाई जाते थे ,अगर सगे भाई नहीं है, तो मोहल्ले में एक जगत भैय्या तो होते ही थे…..

सगा या जगत भैया रिज़ल्ट मालूम करके जब घर आते तो चेहरा ऐसा बनाकर आते कि रिजल्ट बताने तक सस्पेंस बना रहे…..

मम्मी-पापा घबराई हुई प्रश्न दृष्टि से ऐसे देखते थे जैसे कि कह रहे हो ….अबे जल्दी बता ना….बताएगा तभी तो हम डिसाइड करेंगे कि कौन सी वाली आरती उतारनी है ?

उस समय पूरा मोहल्ला परिवार व मित्र होता था । दोस्ती मे अमीरी-गरीबी या होशियार-कमजोर किसी भी तरह का कोई भी भेदभाव नही होता । घर से बाहर ही खेला करते थे । बडे होने पर भी बच्चे बने रहते थे ….

ये सारे कांड और रोमांच तो अखबार के जमाने में ही हुआ करता थे । 

अब आज के ज़माने की बात करे ……
कम्पूटर खोला और फटाक से सारे रिजल्ट सामने…

कितना बोरिंग हो गया । भला ऐसे कोई रिज़ल्ट देखा जाता है …?कोई मजा ही नही …कोई भी पहले जैसी हलचल नही …
अब तो किसी से अपना रिजल्ट छुपा भी नहीं सकते और ना ही झूठ बोल सकते । रिजल्ट आने पर पास या फ़ेल का तो कोई महत्व ही नही है यहॉ तक कि श्रेणी भी इतना महत्व नही रखती ,कितने प्रतिशत नंबर आये है उसी से बात शुरूआत की जाती ।
अभी तो कम्प्यूटराईट्स का जमाना है । खेलने के लिये मोबाईल और कंप्यूटर मित्र हो गये ।वाई-फाई और हाई फाई का जमाना है ।एक से एक अत्याधुनिक संसाधन प्राप्त करने की कोशिश की जाती है । इस कॉम्पिटिशन के जमाने मे पढाई और अन्य एक्टिविटिज का इतना बोझ कि बच्चे बचपन भूलकर जल्दी ही बडे बन गये है । 

चाहे जो कुछ भी हो लेकिन हमारे जमाने की बाते …

एकदम निराली थी ,दिल को बहलाने वाली थी

रिश्तों को सजाती थी ,प्यार को जताती थी

अंतर्मन मे खुशी लाती,दूरियों को मिटाती ….

अब देखते है आज के बच्चो को ,तो लगता उनका बचपन समय से पहले कही खो गया ….

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏
जय सच्चिदानंद 🙏🙏

5 Comments Add yours

  1. सही कहा है आपने।

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    1. धनंयवाद । आज के बच्चे पर पढ़ाई का बोझ देखकर पुराने दिनो की याद आ गयी….

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  2. Jagdish Jat says:

    अगर मुझे खुद ही अपनी एग्जाम की कॉपी जांचने को मिल जाये तब भी 99.6% तो मैं खुद को भी नही दे सकता हैं। पता नही कब हम इस नंबर गेम से जीवन और शिक्षा में बाहर निकल पायेंगे।

    Liked by 1 person

    1. सही बोला आपने । ऐसा ही आजकल हो रहा है । योग्यता का मापदंड नंबरों तर ही सीमित रह गया है ।

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