शब्दो से परिवर्तन

शब्दो से परिवर्तन…. 

शब्दों का हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्व होता है. कुछ शब्दों को बोलने पर लोग ताली बजाते हैं तो दूसरी तरफ कुछ शब्दों को बोलने पर लोग आपत्ति जताते हैं. कभी कभी नौबत तो मार पीट तक की भी आ जाती है । 

यदि अच्छे शब्द बोले जाये तो सुनने वाले व्यक्ति पर बहुत असरदार साबित होता है उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति बहुत प्यासा हो और किसी बुढ़ी औरत से पानी मॉगने के लिये बोलता है ऐ बुढ़िया जल्दी से पानी दे,तो वह उसकी तरफ देखेगी भी नही । लेकिन यदि वह प्यार से बोलेगा कि दादीजी मुझे बहुत प्यास लगी है क्या आप मुझे पानी पिलायेगी ? तो वह खुशी खुशी से बोलेगी कि लो बेटा जितना चाहो पानी पी लो ।

एक प्रसंग स्वामी विवेकानंद के जीवन से सम्बंधित है । एक बार स्वामी विवेकानंद एक सत्संग में शब्दों की महत्वता पर बातचीत कर रहे थे । वह गॉड के नाम की महत्ता समझा रहे थे एक व्यक्ति जो काफी तर्क कर रहा था, उसने कहा कि शब्दों में क्या रखा है, उन्हें रटने से क्या लाभ? उसे जबाव देने के बदले स्वामी जी ने उसे मूर्ख,जाहिल, लम्पट जैसे शब्द कह दिए । ये सारे शब्द सुनकर वह व्यक्ति क्रोधित हो गया और स्वामी जी से बोला कि आप जैसे संन्यासी के मुंह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते? इन्हें सुनकर मुझे चोट लगी है ।

स्वामी जी बोले कि भाई ये तो शब्द हैं, शब्दों में क्या रखा है? मैंने कोई पत्थर तो नहीं फेंका जो आपको चोट लग गयी ।प्रश्न पूछने वाले सहित वहां उपस्थित सभी भक्तों को उत्तर मिल गया ।

अगर शब्द हमें उकसा सकते हैं तो शब्द हमें ईश्वर के नजदीक भी पंहुचा सकते हैं । इसलिए हम जब भी कुछ बोले सोच समझ कर बोले ,जैसे एक बार छोड़ा गया तीर वापस कमान मे नही आ सकता वैसे ही एक बार मुँह से निकला शब्द किसी भी हालत मे रिवर्स नही हो सकता । बोले गये शब्द का इतना प्रभाव होता है कि शब्द लगाव कर सकते है तो दिल पर घाव भी कर सकते है । शब्दो के प्रभाव से इंसान के सोचने की विचारधारा ही बदल जाती है जैसा कि नीचे कहानी मे बताया गया हैं ……

एक राजा जिसका नाम अजितसेन था उनको राजकाज सम्भालते हुये काफी साल  बीत गये । उम्र बढ़ती गई । वह धीरे धीरे बुढापे की और जाने लगा । वह आये दिन राजमहल मे कुछ न कुछ आयोजन करता । कभी संगीत का ,तो कभी नृत्य का,तो कभी कभी पूरे नगरवासियों को भोजन के लिये आमंत्रित करता इस कारण प्रजा बहुत खुशी का अनुभव करती ।

एक दिन उसने अपने दरबार मे संगीत,नृत्य का उत्सव रखा । उसमें अपने राज्य के गुरू तथा मित्र देश के राजाओ को भी सादर आमंत्रित किया। उत्सव को शानदार बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया 

गुरू का मान रखने के हिसाब से राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्राए उसको दी ताकि नर्तकी के अच्छे गीत नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सके।

काफी लंबे समय तक नृत्य चलता रहा । नर्तकी ने देखा की प्रशंसा व पुरस्कार पाने की आशा मे ढोलक वाला तेज़ तेज़ ढोलक पर थाप दे रहा है लेकिन सुनने मे अच्छा नही लग रहा था तो नर्तकी ने उसे चेताने के लिये एक दोहा पढ़ा ….

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ : मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !

इस दोहे को राजमहल के अन्य लोगो ने भी सुना और सुनकर अपने अनुरूप अलग अलग अर्थ निकाला।

ढोलक वाले ने सुना तो वह सतर्क हो कर ढोलक बजाने लगा।

जब ये बात गुरू ने सुनी तो उन्होने सारी मोहरे उस नर्तकी को दे दी।

वही दोहा राजा की लड़की ने सुना तो उसने अपने सभी स्वर्ण आभूषण नर्तकी को दे दिये ।

वही दोहा राजा के लड़के ने सुना तो अपनी हीरे की अँगूठी  उतारकर नर्तकी को दे दी ।

 नर्तकी और गाने वाली ही थी कि राजा अजितसेन ने कहा बस करो । एक दोहे से तुमने इन सबको पागल बनाकर लूट लिया तो आगे के दोहे मे ना जाने क्या गुल खिलाओगी ।

जब ये बात गुरू ने सुनी तो उनकी ऑखो मे ऑसू आ गये और कहने लगा, राजा इसको कुछ न कहो ।ये हम सब की गुरू है। 

इसने मेरी आँखे खोल दी । मै सारी उम्र ज्ञान की बाते व भक्ति करने मे लगा रहा लेकिन परिणाम उसके हिसाब से नही मिलने पर इन दोनो से विश्वास उठ गया और अपने मार्ग से विचलित हो गया ।इसलिये आज यहॉ नृत्य देखने के अलावा और भी बातो मे अपनी साधना नष्ट करने वाला था कि इसने मुझे चेता दिया ।

राजा की लड़की ने कहा, मुझे शादी करने की उतावली हो रही थी और आप मेरी शादी की चिन्ता नहीं कर रहे थे । इसलिये आज मैं पहरेदार के साथ भागकर शादी करने वाली थी ।इसनें मुझे सुमति दी है कि समय का इंतजार करो ,कभी तो तुम्हारी शादी होगी। क्यों अपने पिता की इज्जत खराब करती हो ?

राजा के लड़के ने कहा, आप बूढे होने पर भी मुझे राज्य का उत्तराधिकारी बना नही रहे थे इसलिये मैंने आज कुछ सिपाहियो से मिलकर आपको मार डालने की योजना बना रखी थी । इसने समझाया है कि सब्र रखो आखिर मे राज्य  तो तुम्हे ही मिलना है। क्यों अपने पिता को मरवाने का दुष्कर्म करते हो और कलंक अपने सर लेते हो ?

जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा की भी बुद्धि मे  परिवर्तन हुआ और तुरंत गुरू की मौजूदगी मे राजकुमार का राजतिलक कर दिया और लड़की से कहा बेटी,मैं जल्दी ही योग्य वर देख कर तुम्हारा भी विवाह कर दूँगा।

यह सब देख कर नर्तकी ने कहा की, मेरे एक दोहे से इतने लोग बदल गए लेकिन मैं अभी भी यदि ना सुधरी को लानत है मुझ पर ।आज से मै भी नाच गाना का धंधा बंद करके ईश्वर के नाम का सुमिरन करुँगी।

तो देखा आपने एक दोहे की दो लाईनों से भी ह्रदय परिवर्तन हो सकता है । शब्द का तो इतना महत्व है कि यदि वह दिल से निकलता है तो सीधा दिल मे उतरता है । गुरू,संत या ज्ञानी पुरूष या महापुरूष …इनके कहे शब्दों को सुनकर जिंदगी की पूरी विचारधारा ही बदल जाती है । विचारधारा बदल जाने से पूरी जिंदगी ही बदल जाती है । बस केवल थोड़ा धैर्य रख कर चिंतन करने की आवश्यकता है।  

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

picture taken from google 

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