हम लोग मन्दिर क्यों जाते हैं ?


हम लोग मन्दिर क्यों जाते हैं ?
चाहे मनुष्य कोई भी धर्म या जाति का हो ,सभी में धार्मिक जगहो का बहुत महत्व बहुत माना जाता है। हम किसी भी धार्मिक जगह पर जाते हैं तो अपने अंदर एक आंतरिक सुख व शांति का अनुभव करते हैं । एक अलग सा अहसास होता है जैसे कि सारी चिंताएं चली गयी हो । इसका वैज्ञानिक कारण इन स्थलों के वातावरण से मिलने वाली प्राकृतिक रूप से सकारात्मक ऊर्जा है । यही सकारात्मक ऊर्जा हमें प्रभावित करती है और हमें सुख की अनुभूति होने लगती है।

 गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने अपनी एक पुस्तक “साधना द रियलायज़ेशन ऑफ लाइफ” में कहा है कि ये धार्मिक स्थल आत्मा को सुख प्रदान करते हैं, प्रकृति का यह रूप हमारी आत्मा को परमात्मा से मिलाने में सहायक सिद्ध होता है।

मंदिरों बनाने का कार्य ,प्राकृतिक वातावरण को देखकर बहुत ही सोच-समझकर वास्तु शास्त्र के अनुसार किया जाता है।

 पुराने समय मे मंदिर तो ऐसे स्थलों या पर्वतों पर बनाए गये हैं जहां से सशक्त चुंबकीय तरंगे गुजरती हैं। यहॉ तक की प्रतिमाओं की स्थापना भी ऐसे स्थान पर की जाती हैं जहां चुबंकीय प्रभाव ज्यादा हो। तांबे के छत्र और पाट रखने के पीछे भी यही कारण होता था कि तांबा बिजली और चुंबकीय तरंगों को अवशोषित करने की क्षमता रखता है ।

जब कोई व्यक्ति मंदिर में देवी-देवता के दर्शन करके उनकी परिक्रमा करता है तो वह चारों और व्याप्त सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है जिससे उसके  मन को शांति का अनुभव होता है।

मंदिर हों या कोई भी धार्मिक स्थल , वहॉ जाकर मनुष्य भगवान की मुर्ति के आगे पूज्यनीय भाव से सिर जरूर झुकाता है व उनके भजन  कीर्तन ,पूजा व आरती ,पुष्प अर्पण श्रद्धाभाव से करता हैं । मंदिर के ऐसे भक्तिपूर्ण वातावरण का मिलाजुला प्रभाव भक्त पर पड़ता है। इससे आयनिक प्रभाव होता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति के शारीरिक रसायन परिवर्तित हो जाते हैं और कई बार उसे रोगो तक से मुक्ति मिल जाती है।

 प्रार्थना करने से मन को शक्ति मिलती है तथा विश्वास उत्पन्न होता है जिससे सकारात्मक भाव जाग्रत होने लगते हैं। भजन कीर्तन करने से अंतरमन निर्मल और हल्का हो जाता है। 

ऐसे भक्ति या प्रार्थना कही पर भी की जा सकती है लेकिन मंदिर का स्थान श्रेष्ठ माना जाता है इसका कारण यह है कि मंदिर मे जो गुंबद बना होता हैं उसमें हम जो भी प्रार्थनाये करते है उसकी तरंगें गुंबद से टकराकर हम तक पंहुचती हैं फिर गुंबद तक जाती हैं इस प्रकार यह प्रक्रिया शुरु होती है और एक मजबूत संग्रह बनकर बिना बिखरे संबंधित देवी-देवता तक हमारी प्रार्थना पंहुच जाती है। 

मंदिर के अलावा जब हम किसी अन्य जगह पर परमात्मा या अपने ईष्ट देवी-देवता का ध्यान ,भजन या प्रार्थनाये करते है तो माना जाता है कि हमारी इच्छाएं, प्रार्थनाएं तरंगें बन कर ब्रह्माण्ड में चारो और बिखर जाती हैं । दूसरे शब्दो मे यह भी कह सकते है कि यदि हमे जगत कल्याण के लिये प्रार्थना करनी है तो कही पर भी कर सकते है क्योकि इस भावना से की गई प्रार्थना की तरंगें चारों और बिखर कर फैल जाती है व इसका लाभ सभी को मिलता है ।

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

picture taken from google 

2 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    बहुत खूब

    Liked by 1 person

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