खुद को समय जरूर दें …..

धनवान होना गलत नहीं है बल्कि सिर्फ धनवान ही होना गलत है।आज के युग मे अच्छी जिंदगी जीने के लिये हर इंसान दौड़ भाग करता रहता हैं और भौतिक सुख सुविधा की ज्यादा से ज्यादा चीजे जुटाता है।बड़े बड़े मकान और शादियों गाड़ियों ,पढ़ाई लिखाई ….आदि,अनेक चीजो मे अपनी आमदनी मे से ख़र्च करके अपने आपको प्रफुल्लित करने की कोशिश करता हैं । इसलिये इंसान जैसे ही अपने पॉव पर खड़ा होता हैं तो वह भौतिक सुख सुविधाओं की वस्तुयें जुटाने के लिये ज्यादा से ज्यादा मेहनत करता हैं और अपनी सामर्थ्य के हिसाब से पैसे ख़र्च करता हैं और साथ मे बचत भी करता है ,जो सही भी हैं । सब चीज़ों को ध्यान मे रखते व्यक्ति को अपने लिये भी समय निकालना चाहिये ।उसको अपनी पसंद का कार्य करना चाहिये ।यदि कोई हॉबी हो तो उसे डवलप करना चाहिये इससे उसे आंतरिक शकुन मिलेगा और वह हमेशा आनंद मे रहेगा ।इस संदर्भ मे एक कहानी पढिये …एक नगर का सेठ बड़ा धनवान था। उसके पास अपार धन सम्पत्ति,हीरे जवाहरात थे । वह आये दिन नगरवासियो की भलाई लिये कुछ न कुछ करता रहता था ।वह अपनी सम्पति का हमेशा अच्छे काम मे सदुपयोग करता रहता था । लेकिन ऐसा करने के पीछे का उद्देश्य लोगो की वाहवाही लुटने का होता था । 
अपने को बड़ा दानी बताने के लिये जगह जगह दान करता ताकि उसके नाम की तख्ती लगे और चारों तरफ वाहवाही मिले ।धर्मात्मा सिद्ध करने के लिये आये दिन घर पर लोगो को निमंत्रण देता और धार्मिक आयोजन करता रहता ।साथ ही घर पर नित्य एक साधु को भोजन कराता ही था। 
एक दिन दूरदराज नगर से एक ज्ञानी महात्मा उसके यहां भोजन करने को आये तो सेठ जी ने उनकी सेवा,आवाभगत करने से ज्यादा अपने दान देने की ,नगरवासियों की भलाई करने की बाते व साथ ही साथ धार्मिक आयोजनो आदि की बातों का बखान करने लगा ।वह अपनी स्वयं की प्रशंसा ही प्रशंसा किये जा रहा था ताकि वह महात्मा अपने नगर जाकर उसकी प्रशंसा करे और वहॉ पर भी उसका गुणगान का डंका बजे । भोजन करने के बाद वह महात्मा को अपनी कोठी दिखाने ले गया और बोलने लगा कि देखो महाराज वहाँ से लेकर इधर तक यह अपनी बड़ी कोठी है। पीछे भी इतना ही बड़ा बगीचा है। पास ही दो बड़े बड़े मंदिर है ।अमुक -अमुक शहर में मेरी खूब सारी मिलें हैं। इतने सारी धर्मशालाएँ कुएं मैने बनवाये हैं। मेरे दोनो बेटे यहॉ की सबसे महँगी स्कूल मे पढ़ने जाते हैं। आप जैसे साधु संन्यासियों के भोजन के लिये रोजाना का नियम ले रखा है।सेठ अपनी बातें कहता ही जा रहा था,रूकने का नाम ले ही नही रहा था आखिरकार महात्मा जी ने सोचा अब इसके अभिमान को दूर करना चाहिए। बीच में रोक कर सेठ जी से कहा -आपके यहाँ दुनिया का नक्शा है।सेठ ने कहा कि महाराज बहुत बड़ा नक्शा हैं।महात्मा जी ने नक्शा मँगाया। उसमें सेठ से पूछा “ इस दुनिया के नक्शे में भारत कहाँ है? सेठ ने अंगुली रखकर बताया कि यहॉ हैं ।अच्छा इसमें दिल्ली कहाँ हैं? सेठ ने हाथ रखकर बताया।महात्मा जी ने फिर पूछा ,अच्छा अब बताओ इसमें तुम्हारी कोठी, बगीचे, मिलें कहाँ हैं? सेठ बोला “ महाराज दुनिया के नक्शे में इतनी छोटी चीजें कहाँ से आई? महात्मा ने कहा ,सेठ जी जब इस दुनिया के नक्शे में तुम्हारी कोठी, बगीचे, महल का कोई पता नहीं तो पूरे ब्रह्मांड मे भगवान की लीला व ऐश्वर्य जो एक खेल मात्र है उनके यहाँ तुम्हारे ऐश्वर्य का क्या स्थान होगा?सेठ जी तुरंत समझ गये और महात्मा के पैर मे गिरकर क्षमा मॉगने लगे ।वह ह्रदय से पछतावा करने लगा । महात्मा ने उसको उठाकर गले लगाते हुये बोले कि बेटा मैने यह सब तुमको दुख पहुँचाने के उद्देश्य से नही किया बल्कि मैने सोचा कि तुम प्रंशसा पाने की वजह से लोगो की भलाई के लिये दिन रात कार्य करते हो यदि तुम अपना उद्देश्य प्रशंसा को बदलकर अपने लिये समय निकालकर अपनी इच्छा या अपनी हॉबी से ये सब कार्य करो तो इससे जो संतुष्टि मिलेगी वह बेशक़ीमती होगी ,साथ ही ये बड़ी बात होगी कि तुमने अपने लिये समय निकालकरअपनी पसंद को भी जिंदगी मे जगह दी ।यह बाते सेठ को अच्छी तरह से समझ आ गई ,उसी दिन से उसके व्यवहार मे परिवर्तन होने लगा । अब वह भलाई का हर कार्य अपनी हॉबी की तरह करता न कि प्रशंसा पाने के लिये।
आज के जमाने मे हम में से अधिकाँश लोगों के दो बच्चे हैं। बहुतों का तो सिर्फ एक ही बच्चा है और उनकी जरूरत को पूरा करने की कोशिश करते हैं ।
इन सबके साथ इंसान ख़ुद को समय जरूर दें,क्योंकि आपकी पहली जरूरत खुद आप हैं। अपने आप पर समय देने से मन ज्यादा प्रफुल्लित रहेगा और दुगने उत्साह से कार्य होगा ।एक अजीब तरह की उसको खुशी मिलती हैं ।जो हमेशा तरोताजा रखती हैं जैसे कि उदाहरण के लिये किसी को पुस्तकें पढ़ने का तो,किसी को डाँस का,किसी को जगह जगह घूमने का,किसी को खाने का,सत्संग का ,भजन कीर्तन कोई भी अच्छी हॉबी हो ।
हमे अगली पीढ़ी के लिये पैसे सेविंग करने की बजाय यदि उनको अपने पैरों पर खड़ा करे तो ज्यादा खुशी महसूस होगी साथ मे बच्चों मे भी आत्म विश्वास बढ़ेगा ।
सप्ताह में डेढ़ दिन अपने मित्रों, अपने परिवार वाले को जरूर दे तो रिश्तो का अहसास बना रहता हैं ।कभी कोई हमारी पुरानी तस्वीर मे हमें और लोगो को साथ देखकर पुछेगा कि ये कौन हैं ,तब हम मुस्कुराकर अपने अदृश्य आँसुओं के साथ बड़े गर्व से कहेंगे कि ये वो लोग हैं, जिनके साथ हमने अपने जीवन के बेहतरीन दिन गुजारे हैं।
इन यादों से भी मन मे एक अलग तरह का अहसास छुपा होता हैं जिसकी कोई कीमत नही होती हैं ।
अपने लिये समय निकालने के साथ साथ अपनी मासिक आय का 5 % अपने आनंद के लिए, अपनी ख़ुशी के लिए खर्च करते है तो लगता है कि जिंदगी मे कुछ अपने लिये किया हैं ,कुछ पाया है ।आनंद प्राप्ति के लिए समय निकालये ।
सब मिलाकर सार की बात ये हैं कि हमे दूसरे फर्ज अदा करने के साथ साथ अपनी हॉबी को भी तवज्जो देकर कई गुणा आनंद प्राप्त कर सकते हैं ।
स्वस्थ रहो ,मस्त रहो ,ख़ुद हँसौ और दूसरों को भी हँसाओ 
जय सच्चिदानंद 🙏🙏
लिखने मे गलती हो तो क्षमाप्राथी 🙏🙏

12 Comments Add yours

  1. lalitkohli says:

    right

    Liked by 1 person

      1. lalitkohli says:

        you want earn money online

        Liked by 1 person

  2. pkckd1989 says:

    आपने इतनी बड़ी बात को कितनी आसानी से व्यक्त किया। अतिउत्तम। आजकल सब पैसे के लिए जीने लगे हैं जबकि हमे जीने के लिए पैसा चाहिए था ।

    Liked by 2 people

      1. pkckd1989 says:

        आपका और आपके सुंदर विचार का स्वागत है।

        Liked by 2 people

      2. pkckd1989 says:

        😊

        Liked by 1 person

  3. Madhusudan says:

    बिल्कुल सही लिखा–धनवान होना गलत नहीं है बल्कि सिर्फ धनवान होना गलत है।

    Liked by 2 people

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