अपेक्षा-जिंदगी की किताब (पन्ना # 233)

ऐसे तो दुख के कई कारण होते है उसमे से एक दुख का कारण किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखना। इस बात को एक छोटे से उदाहरण से समझने की कोशिश करते है …
 किसी दिन 500 रू का एक कॉच का महँगा ग्लास व फूल की एक माला एक साथ मे ख़रीद कर लाये । घर आते ही महँगा गिलास हाथ से गिरकर टूट जाये तो हमे दुख होगा परंतु फूल की माला जो सौ रूपये की हैं, वो टूट जाये या शाम तक मुरझा जाये तो भी हम दुःखी नहीं होते। क्योंकि ऐसा हो सकता यह हम मान कर चलते हैं । गिलास की इतनी जल्दी फूटने की हमें अपेक्षा ही नहीं थीं, तो फूटने पर दुःख का कारण बनी परंतु​ फूलों के हार से अपेक्षा नहीं थीं, इसलिए​ वह दुःख का कारण नहीं बनी । इसका मतलब साफ़ हैं कि जिसके लिए जितनी अपेक्षा ज़्यादा, उसकी तरफ़ से उतना दुःख ज़्यादा और जिसके लिए जितनी अपेक्षा कम, उसके लिए उतना ही दुःख भी कम।

इसलिये जितना हो सके जिंदगी मे अपेक्षाओ को कम करते हुये हमेशा ख़ुश रहें !! स्वस्थ रहें !! मस्त रहें !            आभारी विमला
लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

4 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    जिसके लिए जितनी अपेक्षा ज़्यादा, उसकी तरफ़ से उतना दुःख ज़्यादा और जिसके लिए जितनी अपेक्षा कम, उसके लिए उतना ही दुःख भी कम…बहुत खूब लिखा है।

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  2. pkckd1989 says:

    इतनी बड़ी बात को कितनी आसानी से व्यक्त किया आपने। एकदम सही कहा आपने।

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    1. धन्यवाद आपने बात को समझा

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