भूल कहॉ हो गई –जिंदगी की किताब (पन्ना # 241)

इस लेख को लिखने से पहले ये कहना चाहूँगी कि हमारे माता पिता का दर्जा भगवान के बराबर है व हमे उनकी देखभाल खुशी खुशी से करनी चाहिये ।

न्यूज चैनल पर दिखाया जा रहा है कि 12 हजार करोड़ रुपये के रेमण्ड ग्रुप के मालिक विजयपत सिंघानिया (78वर्ष)आज कंगाल हो गये है । आलीशान बंगले के मालिक आज किराये के मकान मे रह रहे है । आलीशान कार मे घूमने की जगह पैदल हो गए। बेटे के मोह मे उनके बेटे ने ही पाई पाई के लिए मोहताज कर दिया। इसी तरह थोड़े दिन पहले आशा साहनी (63 वर्ष)के बारे मे बताया गया उसके शरीर का नौ दस महीने का मृत कंकाल खुद के ही फ्लैट मे पड़ा मिला । बेटे सहित अन्य किसी ने भी उसकी इतने महीनों से खोजखबर नही ली । पूरी घटना का ज़िक्र ना करके इन घटनाओं से कुछ सीख ले सकते है ।

विजयपत सिंघानिया अपने बेटे को अपनी पूरी दुनिया समझते थे। बेटे को अच्छी से अच्छी जगह पढ़ा लिखाकर अपने से ज्यादा कामयाबी की बुलंदी पर देखना चाहते थे। हर पिता अपने बच्चो को बेहतर बनाने का सपना देखता है । विजयपत सिंघानिया ने भी यही सपना देखा कि उनका बेटा उनकी विरासत संभाले, उनके कारोबार को और भी ऊंचाइयों पर ले जाए।विजयपत सिंघानिया की इच्छा पूरी हो गई। उसके बेटे गौतम ने उनका कारोबार संभाल लिया, तो फिर भूल कहां हो गई ? क्यों विजयपत सिंघानिया 78 साल की उम्र में सड़क पर आ गए। 

मुकेश अंबानी के राजमहल से ऊंचा जेके हाउस बनवाया था, लेकिन अब किराए के फ्लैट में रहने पर मजबूर हैं।

आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया दोनो पर नजर डाले तो दोनो के पास करोड़ों का फ़्लैट होते हुये भी अंजाम ऐसा हुआ । हालाँकि बच्चो को अपने माता पिता के साथ ऐसा करना तो दूर सोचना भी महापाप है । तो क्या इसमें दोषी सिर्फ बच्चो का माना जायेगा ?

अब हम जरा एक नजर आम जिंदगी के क्रम पर डालें। बचपन में हम बहुत सारे नाते रिश्तेदार के यहॉ जाते है व उनके साथ उठते बैठते भी है । ढेर सारे दोस्त व भाई बहन के साथ बहुत खेल व खिलौने खेलते है । उम्र बढने के साथ साथ कैरियर बनाने के चक्कर मे अनेको पाबंदियां शुरू हो जाती है । रात दिन पढाई करने मे लगे रहना । जैसे जैसे पढ़ाई मे सफलता हासिल होने लगती है वैसे वैसे कामयाबी का जुनून व साथ मे ढेर सारे सपने देखे जाते है । इन सब मे कामयाबी मिलती है व साथ मे सोचे सपने भी पूरे होते है । आलीशान जिंदगी जीने को मिलती है । फिर शादी ब्याह करके अपना घर परिवार बनता है जिसमें सिर्फ जिंदगी हम और हमारे बच्चे तक ही सीमित हो जाती है । बच्चो के भविष्य बनाने मे माता पिता इस कदर डूब जाते है कि अपने स्वयं पर भी ध्यान नही दे पाते है । बच्चो पर ध्यान देना एक सीमा तक तो ठीक है लेकिन अति कोई भी चीज़ की बुरी होती है । कई लोग इस चक्कर मे दोस्त रिश्तेदार सभी से कटऑफ हो जाते है । साथ मे स्वयं की भी रूचियॉ को मन मे ही दफ़ना लेते है । यही तो होता है आज के आधुनिक ज़माने मे । कई लोग सम्बंधियों पर इम्प्रेशन जमाने के लिये महँगी से महँगी स्कूल कॉलेज चाहे विदेश भी क्यों ना भेजना पड़े बच्चो को भेजा जाता है ।सिर्फ पुस्तको के ज्ञान के लिये लाखो रूपये ख़ून पसीने की कमाई स्वाहा कर देते है लेकिन फ़्री ऑफ कॉस्ट संस्कार देने मे कंजूसी बरतते है । आपस मे कॉम्पीटिशन इतना अधिक बढ़ गया है कि सभी पेरेंटस अपने बच्चो को दूसरे बच्चो से ज्यादा कामयाब देखना चाहते है ।अच्छे संस्कार देना तो दूर ,अपने बच्चो को अपने से दूर भी कर देते है । आज ये बाते काफी हद तक ये बढ़ गयी है । 

आज पेरेंटस की तरफ से एक आम डायलॉग बोला जाता है कि हमने तो अपनी जिन्दगी पूरी जी ली ,हमारा क्या ? अब तो हम अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं, बस बच्चे खुश रहे व सही रास्ते पर लग जाए । उनकी खुशी मे ही हमारी खुशी है । ये नही कह रही हूँ कि माँ बाप गलत सोच रहे या बोल रहे है । वो अपने बच्चे का भविष्य बेहतर से बेहतर बनाने मे रात दिन एक कर देते है । स्वयं तकलीफ मे रहकर भी संतान पर जरा भी तकलीफ नही आने देते है । अगर सिर्फ ये बात ही सही है तो फिर बच्चों के कामयाब होने के बाद बच्चो से शिकायतें कैसी ? बच्चो से अपेक्षाये क्यों ? लेकिन इन सबके के साथ पेरेंटस के डीप डाउन मे बच्चो के प्रति मोह का अधिक होना, लोगो से वाहवाही मिलना ,मान सम्मान पाने की चाहत के साथ स्वयं के बुढापे की जिंदगी का भी सोचना आदि बाते छुपी होती है शायद उन्हे इस बात का अहसास ना भी हो । माफी चाहती हूँ इन बातो के लिये ,शायद किसी को भी कड़वी या बुरी लग सकती है । मै भी पेरेंटस हूँ किसी को दुख नही पहुँचाना चाहती लेकिन आजकल जहॉ भी बात होती है ये वातावरण देखने को मिलता है । 

इन सभी बातो को कहने का आशय सिर्फ इतना है कि बच्चो को पढाई के अलावा अच्छे संस्कारो को भी देने की कोशिश करे। ये जिंदगी अनमोल है, सबसे पहले अपने लिए जीना सीखिए । गरीबी से ज्यादा अकेलापन दुख देता है । क्योंकि जवानी के दोस्त बढ़ती उम्र के साथ छूटते जाते हैं। नाते रिश्तेदार सिमटते जाते हैं..चिंतन करे कि हर पेरेंटस क्यों अपने आप को बच्चो तक ही सीमित कर देते है । सही उम्र मे धर्म के साथ अपनी विशेष हॉबी व शौक़ को बढ़ावा क्यों नही देते है । भविष्य मे यदि बच्चे नालायक या कपूत निकल गये तथा रिश्तेदारों के पास समय का अभाव हो तो कैसे जिएगे ,उस हिसाब से क्यों नही सोचा जाता ।

यदि विजयपत सिंघानिया की बात की जाये तो उसके जाने के बाद सब कुछ तो वैसे भी गौतम सिंघानिया का ही होने वाला था, तो फिर क्यों जीते जी सब कुछ बेटे को सौंप दिया..? क्यों पुत्र मोह मे ये भूल गए कि इंसान की फितरत किसी भी वक्त बदल सकती है।

 जो गलती विजयपत सिंघानिया ने की, वो आप कभी मत कीजिए। स्वास्थ्य व धन को अपने भविष्य के लिये बचाकर रखिये जिसकी बुढापे मे सबसे ज्यादा जरूरत होती है ।कही ऐसा ना हो कि बुढापे मे ये दोनो चीजे ना होने पर आप पूरी तरह बच्चो पर आश्रित हो जाये और बच्चे भी आपकी देखभाल करने मे आनाकानी करने लगे तो क्या अंजाम होगा वो आप समझ सकते है । घर परिवार ,रिश्तों और दोस्तो के साथ अपने बारे मे भी सोचिये । ये जिंदगी आपकी है अपने हिसाब से जीये । किसी से भी अपेक्षा मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं।

आपकी आभारी विमला मेहता

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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