भलाई – जिंदगी की किताब (पन्ना # 252)

Good day to all divine souls ……

भलाई को  एक दृष्टांत से समझ सकते है 

प्यारेलाल बहुत पैसे वाला होकर भी बहुत साधारण कपड़े पहनता था । सर्दी के दिनो मे वह एकदम साधारण कम्बल या शॉल पहन कर घूम रहा था । ऐसा देखकर उसके एक मित्र ने बोल दिया कि यार तेरी ऐसी कंजूसी से रहना देखकर मुझे शर्म आती है । इतना पैसा होने के बावजूद भी इतना साधारण ऊनी कपड़ा पहन कर घूमना ? आख़िर कंजूसी की भी हद होती है । इस पर प्यारेलाल ने कहा कि यदि तुझे मेरे साथ रहने मे शर्म आती है तो खुशी से मेरा साथ छोड सकते हो । मै तो अपने विचारो के हिसाब से पहनता ओढ़ता हूँ । 

इसके बाद काफी दिनो तक दोनो मित्र नही मिले । एक दिन वह मित्र प्यारेलाल के यहॉ मिलने गया तो वहॉ का दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गया । उसने देखा कि प्यारेलाल बहुत ही प्रसन्नता के साथ सैकड़ों भिखारियों को एक एक कंबल दे रहे है तथा साथ मे सभी को प्रेमपूर्वक भोजन भी खिला रहे है । मन ही मन उसने अपनी ग़लतफ़हमी दूर की व प्यारेलाल की भलाई की प्रशंसा खुले दिल से करने लगा ।

इसलिये कहा जाता है कि सज्जनों की सम्पति दूसरो की भलाई के लिये होती है ।

मन वचन काया से दूसरो का भला करना संत पुरूषों का स्वभाव है

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

2 Comments Add yours

  1. bansarir says:

    Behad hi khubshurti se Baya KiyA he apne

    Liked by 1 person

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