ढूँढती हूँ मै -जिंदगी की किताब (पन्ना # 255)

निराशा की परछाइयों  मे 

आशा की किरण ढूँढती हूँ !!

 डूबे हुए किनारों पर मैं 

रेत का निशान ढूँढती हूँ !!

हर एक संबंधो मे

प्यार का अहसास ढूँढती हूँ !!

किसी गुज़रे हुये मुसाफ़िर के

पैरों के निशान ढूँढती हूँ !!

बहते इक तूफ़ान के बाद 

ठहराव की मंजिल ढूँढती हूँ !!

खोये हुये रिश्ते 

यादों के सहारे ढूँढती हूँ  !!

गुज़र चुका जो वक्त 

उसकी यादों के सैलाब ढूँढती हूँ !!

डूबती हुई रोशनी मे 

आशा की किरणें ढूँढती हूँ !!

चाह कर भी कभी ना पाया 

वो अरमान ढूँढती हूँ !!

इन अरमानों की छॉव तले 

आने वाला जहान ढूँढती हूँ !!

फिर एक पल को ठहर जाती हूँ 

सोचती हूँ ,ठहरना नही है सही !!

और इस ठहराव से आगे जाने मे 

और आगे जाने मे गति ढूँढती हूँ !!
आपकी आभारी विमला मेहता 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

8 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    Shaandaar likha hai….
    निराशा की परछाइयों  मे 

    आशा की किरण ढूँढती हूँ !!

     डूबे हुए किनारों पर मैं 

    रेत का निशान ढूँढती हूँ !!

    Liked by 1 person

    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपने सराहा

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  2. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने। बहुत ही खूबसूरत रचना है आपकी।

    Liked by 1 person

    1. धन्यवाद । आपको अच्छी लगी

      Liked by 1 person

  3. बहुत सुंदर रचना

    Liked by 1 person

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