डर -जिंदगी की किताब (पन्ना # 274)

चाहे जग ज़ाहिर ना हो पर हर इंसान के मन मे किसी न किसी बात का डर जरूर छिपा होता है व उसकी वजह से मन ही मन परेशान भी रहता है ।

 उन सब मे से एक सबसे बड़ी परेशानी का कारण है ,वह है निंदा का डर ,समाज का डर । 

वह डरता है कि समाज में उसकी निंदा न हो जाए, 

अगर मैंने ऐसा कर लिया, तो लोग क्या कहेंगे? 

इसीलिए तो वह पाप हमेशा छिपकर करता है ताकि किसी को कानों कान ख़बर ना हो 

और पुण्य  का खुलकर प्रचार करता है ताकि सभी जगह उसकी वाहवाही हो , इज्जत हो ।

इसीलिये सही बात के लिये न तो मित्र से ,न परिवार से, न समाज से ,न शत्रु से डरना चाहिये ।

अगर डरना है तो अपयश व पाप से डरना चाहिये और किसी से डरने की ज़रूरत नहीं। 

डर हमारे निकट ही फटक ना पाये ऐसा स्वयं को मज़बूत बना लेना चाहिये 

क्योकि जहाँ डर से घबरा गये वही हमारी लक्ष्य की नाव डूब गई। 

 डर मानसिक कमजोरी है। मन दुर्बल होने से शरीर भी दुर्बल हो जाता है।

 मनोबल और आत्मविश्वास के बूते पर रोग हटते है ।

 निर्भय मन स्वस्थ शरीर का आधार बनता है। इसलिए भय से मुक्त होना स्वस्थ जीवन का सरलतम मंत्र है। 

आपकी आभारी विमला मेहता 
जय सच्चिदानंद 🙏🙏

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

7 Comments Add yours

  1. गीता मे गोविंद ने कहा है कि ये दुनिया भयाटवी है, भय तो स्वरुप है इसका। कुछ भी अच्छा करने जाओगे तो आपको भय लगेगा, बुरा करने मे कभी भय नही लगता आजकल। सच बोलो आपको भय लगेगा, और झूठ बोलो तो आपको स्वयं आनंद आएगा कि देखो नाऊ आई विल होल्ड द सिचुएश्न। पूर्व की बुराईया ही आज का भय है।
    जब तमाम बुराई से हट जाएगें तो भय स्थाई रुप से समाप्त हो जाएगा, फिर ना स्थिती भयभीत कर पाएगी ना परिस्थिती भयभीत कर पाएगी। तब आनंद की स्थिती प्राप्त होगी और जो व्यक्ति आनंदित हो जाता है वो फिर दुख मे भी नाचता हुआ नजर आएगा।

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    1. शुक्रिया । आपने और भय के बारे मे जानकारी दी । आपकी यह बात सही है कि जब तमाम बुराई से हट जायेंगे तो भय स्थायी रूप से समाप्त हो जायेगा और आनंद की स्थिती प्राप्त होगी …..बहुत खूब
      मेरा ऐसा मानना है कि झूठ बोलने वाला इंसान बाहर से कितना भी आनंदित दिखता हो लेकिन आंतरिक रूप से उसका झूठ खुलने का भय हमेशा लगा रहता है । सच बोलने वाले इंसान को कभी भी सच याद रखने की जरूरत नही पड़ती है जबकि झूठ बोलने वाले व्यक्ति को हमेशा अपनी बात झूँठ खुलने के डर से याद रखनी पड़ती है । कई बार याद ना रखने पर बात का फर्क होने पर झूठ पकड़ा जाता है फिर सबका उस पर विश्वास उठ जाता है । बुरा करने वालों का भी यही होता है । कहते है ना जब तक पुण्य कर्म का संचय होता है तो बाजार मे खोटा सिक्का भी चल जाता है लेकिन पाप कर्म उदय मे आने पर वह प्रकृति किसी को भी नही छोड़ती । राजा भी रंक बन जाता । जय सच्चिदानंद !

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      1. जी बिल्कुल, सही फरमाया आपने।

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  2. दार्शनिक विचार ह आपके विमला जी

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  3. Madhusudan says:

     डर मानसिक कमजोरी है। मन दुर्बल होने से शरीर भी दुर्बल हो जाता है…बिल्कुल सही लिखा।

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