सीता माता को जब रावण हरण करके ले गया 

तब मन्दोदरी ने रावण से पूछा कि 

“हे रावण ” यदि आपकी सीता में इतनी ही रूचि थी तो 

आप राम का वेश धरकर भी सीता को ले जा सकते थे ,

साधु का वेश बनाने की क्या जरूरत थी ?

रावण बोला देखो “मन्दोदरी ” पहले मैने राम के वेश के बारे में ही सोचा था लेकिन 

उस रूप मे मुझे हर स्त्री माता के रूप में दिखाई दी ,

इसलिए मैंने वह रूप ना अपनाकर साधु का रूप धारण कर लिया । 

साधु के रूप में मैं सभी लोगो को यह दिखाना चाहता था 

कि जिस रूप पर उनको सर्वाधिक विश्वास है,

वह रूप भी ऐसा भी गुल खिला सकता है ।

अब दिमाग का फलूदा बनाने की कोई जरूरत नही …. 

ईश्वर पर भरोसा करो बाबाओं पर नही.. 😃😃😇😇

आपकी आभारी विमला मेहता 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

8 Comments Add yours

  1. वैसे सनातन दर्शन मे कहा गया है कि मुनि वाणी से होता है, जो कम बोले और समय पर बोले वो मुनि है और जितना पूछा जाए उतना ही बोले।
    ऋषि ज्ञान से होता है, वो गृहस्थी भी हो सकता है। तगड़ा ज्ञानी ऋषित्व को प्राप्त होता है।
    साधु ह्रदय से होता है, संत ह्रदय नवनीत समाना। फर्क नही पड़ता कि उसकी वेश भूषा क्या है। एक सरल और करुणामय ह्रदय का नाम साधु है।
    महात्मा आचरण से होता है। जिका मन कर्म वचन एक हो वो महात्मा है। मन कही और, कर्म कुछ और वचन का अता पता ना हो वो दुरात्मा है।

    आपने दुरुस्त लिखा कि हम वेश भूषा से साधुओ की पहचान करते रहते है और अंत मे परिणाम हमारे सामने होता है।

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    1. सही लिखा है । बहुत ही अच्छी बातो की आपने जानकारी दी …बहुत धन्यवाद

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  2. जी बिल्कुल।
    साधु वेश का नाम नही वरन् स्वभाव का नाम है। साधु का वेश धारण करने मे 70रु से ज्यादा खर्च नही होते पर साधु का स्वभाव धारण करने मे 70 जन्म भी छोटे पड़ जाते है। साधु एक निष्कपट ह्दय का नाम है।
    वैसे

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    1. सही बात कही है आपने !! धन्यवाद

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  3. Madhusudan says:

    kya baat…..rawan jaisa gyani ke aise vichar phir …….in babaon ka kyaa…..umda lekhan……Ishwar se prem karne ke liye baba ki waise bhi kya jarurat……..

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    1. शुक्रिया …सही बात है ईश्वर प्रेम के आगे कुछ नही

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  4. सत्य वचन विमला जी

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