काल चक्र (भाग तीन) — जिंदगी की किताब (पन्ना #284)


आपको पिछले लेख मे पहले आरे की जानकारी से अवगत करवाया । अब दूसरे व तीसरे आरे के बारे मे आपको बताते है 

2.  दूसरा आरा – 

सुषमा काल …..

शास्त्रों के अनुसार छ: आरे होते है । पहले आरा के बारे मे आपको जानकारी मिल चुकी है । इस आरे की स्थिती भी प्राय : प्रथम आरे की तरह भी होती है । इसमे मानव के सुख मे धीरे धीरे कमी आने लगती है । मनुष्य की उँचाई चार हज़ार धनुष रह जाती है । आयु भी घटकर कम हो जाती है । पृष्ठास्थियो की संख्या घटकर 128 रह जाती है ।काल के प्रभाव से जैसे जैसे इस आरे की अवधि व्यतीत होती है वैसे वैसे इसके सुखों मे कमी आती जाती है । इस आरे के फल भी इतने रसदार व मधुर व शक्तिदायक नही रहते । दो दिन बाद ही भोजन करने की इच्छा हो जाती है । मानव के शरीर की प्रकृति मे भी परिवर्तन आ जाता है । मृत्यु के छ: महीने शेष रह जाने पर युगलनी एक पुत्र पुत्री को जन्म देती है ।जिसका पालन पोषण 64 दिन किया जाता है । यानि की पहले आरे की तरह तक़रीबन स्थिती होती है ।

इस आरे की समाप्ति के बाद अवसर्पिणी काल का तीसरा आरा शुरू होता है ।

3. तीसरा आरा ..

सुषमा – दुषमाकाल

शास्त्रों के अनुसार छ: आरे होते है । दो आरों के बारे मे आपको जानकारी मिल चुकी है । यह आरा शुभ और अशुभ अर्थात सुख बहुत दुख थोड़ा होता है ।इस आरे के आरम्भ मे मनुष्यों की देहमान दो मील ,आयु एक पल्य और पृष्ठास्थियो की संख्या 64 होती है ।मनुष्यों को प्रतिदिन भूख लगती है । किन्तु आहार सिर्फ फलो का ही किया जाता है । बालक भी अपने जन्मदिन के 79 दिन के पश्चात सबल और संज्ञान हो जाते है । कल्पवृक्ष भी अब सूखे से दिखाई देते है । अब उनकी गुणवत्ता भी पहले से कम हो जाती है ।जैसे जैसे आरे का समय बीतता है वैसे वैसे मनुष्यों के सदगुणो मे भी कमी आने लगती है ।लोभ का भी जन्म हो जाता है जिसके कारण मानव दुख उठाता है । मनुष्यों की मनोवृत्ति मे भी परिवर्तन आ जाता है । अनुशासन की व्यवस्था स्थापित करने के लिये नियमों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगती है । अब ऐसे मनुष्यों की आवश्यकता लगने लगती है जिससे सब लोग डरते रहे और जो सबसे शक्तिशाली व संज्ञान भी हो व साथ मे बुरे व मलिन कार्य करने वाले को दंड भी दे सके । 

पृथ्वी का स्वाद गुड जैसा रह जाता है । पुत्र , पुत्री का पालन 79 दिन करने के बाद माता पिता मरकर देवगति को जाते है । अंतिम क्रिया प्रथम व द्वितीय आरे की तरह होती है । 

इस आरे मे तीन भाग होते है । पहले दो भागो का व्यवहार प्राय: पहले व दूसरे आरे के समान ही चलता है । अंतिम तीसरे भाग मे कर्मभूमि की नींव लगती है । तीसरे भाग मे उत्पन्न होने वाले व्यक्ति चारों ही गतियो मे जाते है । 

राजाओं व राज्यों की उत्पत्ति की नींव भी इसी युग मे पड़ती है ।क़ानूनों की रचना होती है । दान देने की प्रथा, पाप पुण्य की पहचान,विभिन्न कला व शिक्षाओं का पता ,विधी विधान के साथ विवाह प्रथा का प्रचलन …इसी युग मे होता है ।

इस प्रकार अवसर्पिणी काल के प्रथम तीन काल खंड जिन्हें भोग भूमी की भी संज्ञा दी जाती है , व्यतीत होने पर कर्म भूमी का प्रारम्भ होता है । 

 आगे पढिये चौथा व पॉचवां आरा ….continued 

आपकी आभारी विमला मेहता 

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏
जय सच्चिदानंद 🙏🙏

2 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    bahut badhiya……apni lekhni se sajaa daalaa…..

    Liked by 1 person

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