प्रभु के साथ – जिंदगी की किताब (पन्ना # 300)

संत ख़ैयाम अपने शिष्य के साथ वन मे जा रहे थे । नमाज़ का समय होने पर दोनो ने चादर बिछाई व नमाज़ पढ़ना प्रारम्भ किया इतने मे ही तेज़ आवाज़ के साथ गर्जना करते हुये एक शेर दिखाई दिया । इसे देखकर शिष्य डर कर पेड के ऊपर चढ़ गया लेकिन संत अपनी नमाज़ मे लीन रहे। शेर आया और चला गया । शिष्य पेड से उतरा और नमाज़ पढ़ी ।दोनो ने नमाज़ पूर्ण की व चादर उठाकर आगे चले गये । उसी समय एक मच्छर संत के नाक पर आकर बैठ गया व काट गया । मच्छर के काटते ही संत वेदना सहन ना कर सके और चीख़ उठे । शिष्य यह देखकर हैरान हो गया और अपने आप को रोक ना पाया और संत से पूछा कि संतवर ये क्या ? जब आपके सामने शेर था तो भी आप जरा भी विचलित नही हुये लेकिन इस छोटे से मच्छर के काटते ही आप चिल्ला उठे । यह अंतर क्यों ? संत ने बहुत ही गहरा उत्तर देते हुये कहा कि उस समय मै खुदा के पास था और इस समय इंसान के साथ हूँ ।

बाहरी रमणता को छोड़कर ,रहो प्रभु के साथ

प्रभु मे लीनता ,फल देती हाथोहाथ

आपकी आभारी विमला मेहता 

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

6 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    kyaa khub kahani likha…..ishwar ke dukh kaisaa…..insaan ke paas sukh kaisaa….? phir bhi jeena hai insaano ke beech to dukhon men hi khushiyaa talaste phirte hain ham……

    aapne 1 se 6 ara kaa jikra kiya hai purv men wah kis dharm me kis kitab men likha hua hai……

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    1. ये जैन शास्त्र मे लिखा है

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  2. जय सच्चिदानंद

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