ज़माने की बात – जिंदगी की किताब (पन्ना # 310)

ज़माने की बात ….

शहर -शहर मे पाषाण के घर है

कच्चे घर अब रखता है कौन ?

ठंडी हवाओ के लिये एयर कंडीशन है 

रोशनदान अब कौन रखता है कौन ?

अपने घर से निजात मिले तो गैरो की सुने ,

पराई दीवार पर कान अब रखता है कौन है ?

खुद ही पंख लगाकर उड़ा देते हैं चिड़ियों को

परिंदों मे जान अब रखता है कौन ?

हर चीज किश्तो मे मुहैया है 

हसरतों पर लगाम अब रखता है कौन ?

वृद्धाश्रम में झूठ बोलकर मां बाप छोड जाते है 

घर में पुराना सामान अब रखता है कौन ?

हर एक को दिखता है दूसरे में बेईमान इंसान

खुद के भीतर ईमान को अब देखता है कौन ?

फिजूल बातों पर वाह वाह करते है सब

अच्छी बातों के लिये जुबान अब रखता है कौन ?

बच्चो को आया के भरोसे छोड जाते है मॉ बाप

संस्कार देने के लिये अब रह गया है कौन ?

ज्ञान की  बाते करके ज्ञानी बनते है सब

असली ज्ञानी की पहचान रखता है कौन ?

रिश्ते निभाने की बड़ी बड़ी बाते करते है सब

असली रिश्ता निभाता है अब कौन ?

आपकी आभारी विमला विल्सन मेहता

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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