मनुष्य भव अत्यन्त दुर्लभ भव – जिंदगी की किताब (पन्ना # 19)

मनुष्य भव अत्यन्त दुर्लभ भव हैं क्योंकि भगवान की वाणी नर्क के जीव सुन नही सकते । तिर्यंच ( पशु पेड़ आदि ) वाले जीव समझ नही सकते । देवगति में पालन नही कर सकते ।केवल मनुष्य भव ही है जिसमे मानव प्रभु की वाणी को सुनकर समझकर आचरण भी कर सकते हैं। मनुष्य भव से ही मोक्ष जा सकते हैं।देवता भी मोक्ष मे जाने के लिये मनुष्य भव पाने के लिये तरसते है । मनुष्य योनि मे कर्मो का भोग हमे पूर्व जन्मों के कर्मों से ही भोगना पड़ता हैं ।उसी आधार पर हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं, सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।संतान की हमारे जीवन मे अहं भूमिका होती है । 

सन्तान के रुप में कौन आता है ? इस बारे मे शास्त्रो मे वर्णन किया गया है कि सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का ‘सम्बन्धी’ ही आकर जन्म लेता है । जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है —

ऋणानुबन्ध संतान -पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे किसी भी प्रकार का ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह हमारे घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।

शत्रु संतान -पूर्व जन्म का कोई दुश्मन अपना बदला लेने के लिये हमारे घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा । हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा ।

उदासीन संतान-इस प्रकार की सन्तान ना तो माता-पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है । बस, उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है । विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाते हैं ।

सेवा करने वाली संतान-पूर्व जन्म में यदि कोई किसी की खूब सेवा करता है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए पुत्र या पुत्री बनकर आता है और मॉ बाप की सेवा करता है ।

 इस प्रकार होने से यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं । इन चार प्रकार में कोई और योनि का भी जीव आ सकता है । जैसे कोई इंसान किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा करता है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकता है । यदि वह गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल देता है तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगा । यदि उसने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और हमसे बदला लेगा ।

इसके अलावा और भी रिश्ते नाते या जो कुछ भी प्राप्त होता है ,अपने किये गये कर्मो के आधार पर होता है इसलिये कभी भी किसी का बुरा ना करें । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि हम अच्छा या बुरा जो भी करेंगे प्रकृति उसे इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी । उदाहरण के लिये यदि हम किसी को एक रुपया देते है तो समझो हमारे खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं । यदि हमने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो हमारी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये  
ज़रा सोचिये, हम कौन सा धन साथ लेकर आये थे और मरने के बाद कितना साथ लेकर जाऐंगे । जिंदा रहने तक धन-दौलत जो भी हो उसको अच्छा उपयोग किया ,वहॉ तक तो ठीक है लेकिन जो बैंक में बिना उपयोग के पड़ा रह गया, समझो वो व्यर्थ ही कमाया । सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा ,यदि कुछ साथ जायेगा भी तो सिर्फ दूसरो के लिये की गई निस्वार्थ भाव से भलाई और किया गया परोपकार ।

संतान के बारे मे इतना ही कहना है कि संतान के लिये धन संपति जमा करने से पहले उसे क़ाबिल बनाना ज्यादा जरूरी है व साथ मे यह  बात भी दिमाग मे रखने की जरूरत है कि औलाद अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है, खुद ही खा-कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ, वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही छोड़ेंगे  

मनुष्य भव कैसा दुर्लभ है इसके लिये कुछ दृष्टान्त लेते हैं 
1…एक राजा था ।एक बार किसी बात से प्रसन्न होकर उसने मंत्री को एक कीमती शॉल भेंट के रूप मे दी ।ठंड होने की वजह से मंत्री वही शॉल ओढ़कर घर की और जा रहे थे कि अचानक तेज़ छींक आ गई ।मंत्री ने उसी शॉल से नाक पोंछ लिया ।कुछ लोगो ने देख लिया और राजा को जाकर बता दिया ।राजा को ग़ुस्सा आ गया कि मंत्री ने उसकी दी शॉल से नाक कैसे पोंछ लिया ।तुरंत मंत्री से वह शॉल छीन ली ।इतना ही नही उसे नौकरी से भी निकाल दिया ।मंत्री अपनी भूल की माफी मॉगकर पछतावा भी करने लगा लेकिन राजा न माना ।एक दयालु महात्मा यह सब देख रहा था ।उसे रहा नही गया ।वह अगले दिन उस मंत्री के यहॉ गया और समझाने लगा कि देखो बेटा एक राजा कि दी साधारण सी वस्तु का तुमने दुरूपयोग किया तो ऐसा दुष्फल मिला तो कल्पना करके सोचो कि परमात्मा का दिया मनुष्य भव का दुरूपयोग करने पर कितना दुष्फल भोगना पड़ेगा ।संयम,त्याग,ज्ञान,परोपकार ….आदि अनेकों बातों मे जीवन लगाना सदुपयोग हैं जिससे ईश्वर प्रसन्न होता हैं सदगति देता हैं ।
दूसरा दृष्टान्त ………

एक लकडहारा हर साल लकड़ियों का ठेका लेकर उसमें सूखे पेड़ों को जला देता और उससे कोयले बनाकर बेच देता ।इस प्रकार वह अपने परिवार को चलाता। एक दिन जंगल मे थके हारे राजा को ठंडा पानी पिलाया ।उससे प्रसन्न होकर राजा ने अपना चंदन का बग़ीचा उसको दे दिया ताकि वह रोज़ कोयला बनाने के कष्ट से बच जाये ।परंतु लकडहारे को मालूम नही था कि चंदन की सूखी लकड़ियों बेचकर लाखों रूपये कमा सकता हैं ।उसने तो चंदन की लकड़ियों को भी जलाकर कोयले बनाना शुरू कर दिया । जब इस बात का राजा को मालूम चला तो राजा ने सोचा कि जब लकडहारे को चंदन की कीमत का मालूम ही नही तो उसे देने से क्या फायदा और उससे वापस बगीचा लेकर जंगल का ठेका दे दिया । 

ये दोनो दृष्टांत कहने का सार यह है कि शॉल व चंदन के बगीचे की तरह हमें कीमती मनुष्य जन्म मिला है ।यदि हम इसको ऐसे ही बिना सोचे समझे खराब या नष्ट कर देंगे तो सबसे बड़ी भूल होगी ।

नर का जन्म बार बार न गँवा,सुन !!
आज ही सँवार ,अवतार न बिगाड़ ।

आपकी आभारी विमला विल्सन मेहता
जय सच्चिदानंद 🙏🙏
लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

2 Comments Add yours

  1. दुर्लभ ज्ञान
    बहुत प्रेरक प्रसंग के साथ

    Liked by 1 person

    1. धन्यवाद आपको पसंद आया

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