जिंदगी ऐसे जीओ – जिंदगी की किताब (पन्ना # 322)

जिन्दगी जीना है तो खरबूजे की तरह जीओ ना कि ऑरेंज की तरह …….

एक  बार बाजार गये वहॉ से घर पर सबकी पसंद के हिसाब से काफी तरह के अलग अलग सब्जी व फल ख़रीद लाये । ऑरेंज व ख़रबूज़ा रखते समय दादीमाँ ने सहसा मुझसे पूछ लिया कि बताओ बेटा तुम्हे दोनो मे से कौनसी चीज़ पसंद है । मैने कहा दादीमाँ ऐसा आप क्यों पूछ रही है । मुझे तो दोनो पसंद है । दादीमाँ बोली देखो बेटा खाने के लिये तो दोनो अच्छे है पर जिन्दगी जीने के लिये ख़रबूज़ा ज्यादा अच्छा है । मै अचरज से बोली कि वो कैसे ? दादीमाँ बोली कि ऑरेंज दिखने मे बाहर से एक लगती है लेकिन जैसे ही छिलका हटाते है अंदर टुकड़ों मे बँटी होती है जबकि ख़रबूज़ा बाहर से धारियों मे बँटा होता है लेकिन छिलके हटाने पर एक दिखाई देता है ।

ठीक इसी तरह परिवार,छोटे छोटे टुकड़ों मे बँटा समाज व राष्ट्र , अलग अलग  धर्म , जाति , सम्प्रदाय यदि वक्त और तख़्त के साथ ख़रबूज़े की तरह एक हो जाये तो संसार की कोई भी ताकत उन्हे ना तो कभी कमज़ोर कर सकती ना ही गलत फायदा उठा सकती है ।

इसलिये देश, समाज, परिवार के विकास व आदर्श के लिये ख़रबूज़ा बनने की जरूरत है ना कि ऑरेंज । 

आपकी आभारी विमला विल्सन मेहता 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

4 Comments Add yours

  1. Bohot khub bola Hai aap ke dadi ne! 😊

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    1. Thanks! Aapko accha laga

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  2. Madhusudan says:

    क्या बात तरबूजे और संतरे के द्वारा गजब ढंग से परिवार और समाज का विश्लेषण किया है।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपने सराहा

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