सोच # जिंदगी की किताब (पन्ना # 327)

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 माँ को खा गयी मॉम

पिता को खा गया डैड

दादाजी को खा गये ग्रैंडपा

भाई को खा गया ब्रो 

बहन को खा गई सिस

अब कर लो सबको मिस

 नमस्ते को खा गया हैलो

पाठशाला को खा गया स्कूल 

 परंपरा को खा गया कल्चर 

कृषि को खा गया एग्रीकल्चर

घर की महफ़िल को खा गया डिस्को बार

 रिश्ते नाते को कर दिया तार तार

आटा को खा गया नूडल्स

बड़ा पाव को खा गया बर्गर

पनीर को खा गया चीज़ 

लड्डू को खा गया केक

रोगों से कर लिया हैंडशेक

सबसे अंत मे 

ज़रूरियात ना होने पर भी 

हमारे हिन्दी बोल को भी खा गये अंग्रेज़ी बोल !

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आपकी आभारी विमला विल्सन