गुणो का आकंलन # जिंदगी की किताब (पन्ना # 347)

किसी भी इंसान के गुणो की प्रशंसा का आंकलन उसको समझने के बाद ही मालूम पड़ता है । इसको एक दृष्टांत के द्वारा जान सकते है  ।

एक बार कीचड व चंदन मे आपस मे बहस बाज़ी हो गई । दोनो अपने आप को श्रेष्ठ बताने लगे । चंदन बोला कि कीचड तु तो मेरी कैसे बराबरी कर सकता है । मै सबको शीतलता देता हूँ । मुझमें तेज दाह ज्वर की पीड़ा शांत करने की भी ताकत है । मै आग से झुलसते लोगो को भी ठंडक पहुचॉता हूँ । इतना ही नही मेरी महक दूर तक महसूस की जा सकती है । मुझे ख़रीदने के लिये भी अच्छी कीमत चुकानी पड़ती है । मै कितना मूल्यवान हूँ इसका तुमको अंदाज़ा भी नही होगा ।

कीचड गुस्से से बोला चंदन बंद करो अपनी प्रशंसा करनी । कमल का फूल भी मेरे बीच मे खिलना पसंद करता है ।मै तो हमेशा मुस्कुराता रहता हूँ व शीतलता भी देता हूँ ,इसलिये मै तुमसे श्रेष्ठ हूँ ।

अब दोनो की आपस मे बहसबाजी बढ़ गई । कोई भी झुकने को तैयार नही । आख़िर मे दोनो ने तय किया कि किसी और से निर्णय करवाते है ।

सामने मेंढक दिखा उसी को निर्णायक बना दिया । और अपनी अपनी बात कह दी । मेंढक बोला कि ,देख चंदन तु बिना वजह अपनी प्रशंसा के पुल बॉध रहा है । हकीकत मे तो कीचड तुमसे ज्यादा गुणो वाला है । ये कितनी शीतलता देता है ।

बेचारे मेंढक की भी क्या गलती , जो कभी चंदन के सम्पर्क मे रहा ही नही , भला उसके गुणो को कैसे जानेगा । वह तो रात दिन कीचड के सम्पर्क रहता है तो उसके लिये गुणो मे वही श्रेष्ठ लगेगा ।

कोई भी इंसान यदि किसी के गुणों से अपरिचित होता है तो वह भला वह उसके गुणो की महत्वता का आकंलन बिना जाने कैसे कर सकता है ?

हर इंसान की समझ उसकी सोच के दायरे तक ही सीमित होता है । जैसे कि कुऐ मे रहने वाला मेंढक की सोच कुऐ तक ही रहेगी वह कभी चंदन के सम्पर्क मे आया ही नही तो वह उसकी बात को कैसे समझेगा ।

सार यह है कि जितनी अपनी सोच का दायरा बढ़ाएँगे उतनी ही समझ बढ़ेगी । समझ बढने से जिन्दगी सरल होती जायेगी ।

ऊँची सोच , ऊँची समझ !

आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏