पराई पीड़ा का पहचान # जिंदगी की किताब (पन्ना # 400)

पराई पीड़ा का पहचान ……..क्या हम सभी मानव अपनी आत्मा के समान दूसरे की आत्मा को मानते है ? तो सभी का जवाब होगा कि हॉ , हम सभी इंसान की आत्मा को एक समान मानते है । लेकिन यदि हमें इसका मापदंड करना है तो कर सकते है ।

जैसे कि अभी सर्दी का समय चल रहा है और हमारे सामने कोई बेहद गरीब आदमी सर्दी के मारे थर् थर् कॉप रहा है । हमारे पास कुछ अतिरिक्त ऊनी कपड़े पड़े है , यदि हमारे मन मे पराई पीड़ा का अहसास होगा तो हम उस गरीब की ठिठुरती हालत को देखकर तुरंत अतिरिक्त ऊनी कपड़े निकाल कर दे देंगे ।

इसी प्रकार हमारे भोजन करने के बाद कुछ रोटी, चावल,सब्जी बच गये हो । यदि मन मे भोजन को किसी भूखे गरीब को ना देकर दूसरे दिन खाने की तृष्णा बनी रही या रोटी को सुखा कर या खाखरे सेक कर रख दिया , तो इसका मतलब अभी तक हम दूसरों की आत्मा को हमारे समान समझने मे समर्थ नही है ।

यदि हम अपनी आत्मा की तरह दूसरे की आत्मा की तरह मानते है तो यह निश्चय ही यह हमारा परमात्मा की तरफ बढ़ता हुऑ कदम है ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

4 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    Bilkul sahi kaha…..magar aaj insaan atma aur parmatmaa se jyaada jaati aur dharm ko tawajjo de rahaa ….jo dukhad hai…..umda likha hai aapne.

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    1. सही बात है …. बहुत बहुत शुक्रिया

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