स्वावलम्बन independency) , परावलम्बन # जिंदगी की किताब (पन्ना # 406)

क्या अच्छा है स्वावलम्बन होना या (independency) , परावलम्बन होना ?

हर मनुष्य मे किसी भी कार्य को करने की अगाध क्षमता व शक्ति होती है । अपनी पसंद या नापसंद कार्यो के अनुसार उसकी हर क्षेत्र मे अलग अलग क्षमता होती है लेकिन होती जरूर है। बस जरूरत है अपने ऊपर भरोसा रखने की व स्वावलम्बन होने की ,हम किसी और की शक्ति पर निर्भर ना रहे ।

चाहे कोई इंसान गृहस्थ हो या ना हो , परावलम्बन किसी के लिये अच्छा नही है ।जो भाई या बहिनें अपने हाथ से कार्य नही करते , आलस्य से भरे होते है व दूसरे पर आश्रित रहते है , वह धीरे धीरे अपनी शारीरिक क्षमता खोने लगते है व उनमें साहस की कमी , असमर्थता , दीनता व रूग्णता आने लगती है ।

बहुत साल पहले हमारी दादी एक सच्ची घटना सुनाती थी कि एक करोड़पति सेठ के यहॉ काफी इलाज करने पर भी संतान का जन्म नही हो रहा था । वंश को आगे बढ़ाने के चक्कर मे उसने दूसरी शादी भी कर ली फिर भी संतान नही हुई । अब क्या करे समझ नही आ रहा था ? सेठ मे कोई कमी नही थी । एक समझदार बुजुर्ग ने सेठ को सलाह दी कि सेठानी शारीरिक श्रम बिल्कुल नही करती आप उनको चक्की चलवाइये ।उस समय आज की तरह जिम नही होता था व औरतें घर के बाहर कम ही जाती थी । ऐसा ही किया गया ,परिणामस्वरूप सेठानी को संतान सुख नसीब होने लगा ।

हमे भाग्य के भरोसे नही बैठना चाहिये ।हम कोई भाग्य का खिलौना नही है वरन भाग्य के निर्माता है

हमारा पुरुषार्थ ही हमे सुख या दुख देता है।हमारा आज का किया गया पुरुषार्थ कल भाग्य बनकर दास की तरह हमारा हर कार्य को सफल करने मे सहायक होगा । जो मनुष्य उदयोगशील के साथ अपने बूते पर खड़ा रहता हो , अपने पुरुषार्थ पर भरोसा रखता हो ,ऐसे इंसान- मनुष्य तो क्या सारी प्रकृति को जाग्रत कर देता है ।

पग पग पर दूसरों से मदद मॉगना ,बात बात मे पराया मुँह ताकना एक प्रकार का भिखारीपन है ।

ऐसा कहने का मक़सद यह नही है कि हम किसी से कोई भी मदद नही मॉगे , बल्कि पहले स्वयं हर प्रकार की कोशिश करे बाद मे जरूरी व उचित हो तभी मॉगे ।

स्वाधीनता या स्वतंत्रता पाना स्वावलम्बन की पहली शर्त है तो दूसरी शर्त दूसरों पर तिल भर भी अपेक्षा न रखना ।

स्वाधीनता चाहना और स्वाधीनता पाना , दो बातें है व दोनो मे अंतर है । आज सबको स्वतन्त्रता तो चाहिये पर उसे पाने के लिये प्रयत्न नही करना है क्योंकि उसके लिये उत्सर्ग की आवश्यकता होती है ।

स्वतन्त्रता का पथ फूलो से नही कॉटो से आकीर्ण( व्याप्त) होता है ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

2 Comments Add yours

  1. बहुत खूब लिखा है

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया

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