आंतरिक या बाह्य योद्धा ? # जिंदगी की किताब (पन्ना # 310)

हम सभी एक तरह से अपनी संपूर्ण जिन्दगी के बाह्य व आन्तरिक युद्ध के योद्धा है ।

हमारे चक्षु बाहर की दुनिया को देखने मे इतने अभ्यस्त है कि उन्हें कभी अपने अंदर झॉकने का ध्यान ही नही जाता । लेकिन जिस दिन हम आंतरिक चक्षु के अभ्यस्त हो जायेंगे ,उस दिन हम अपने भीतर का हाल जानकर चकित हो जायेंगे कि हमारे भीतर ही देवीय शक्ति व आसुरी शक्ति छिपी है व दोनो के बीच निरंतर युद्ध चलता रहता है ।जिसमे क्रोध , मान, माया ,लोभ ,मोह आदि आसुरी शक्ति के प्रधान योद्धा है व अहिंसा, सत्य, संतोष,क्षमा आदि देवी शक्ति के सूरमा है ।

प्रश्न है कि हम किस पर विजय चाहते है ?

अगर आसुरी शक्ति पर विजय पाना है तो देवी शक्ति का विकास करना पड़ेगा । जो भी महान बना है वह देवी शक्ति के विकास द्वारा आत्मा का कल्याण करके महान बना है ।

एक बाह्य युद्ध अनेक युद्धों का जनक होता है व इस युद्ध से युद्ध की परंपरा खत्म ही नही होती ।इस युद्ध मे जीत क्षणिक होती है लेकिन अशांति घटने की बजाय बढ़ती जाती है ।

आंतरिक युद्ध ठीक इसके विपरित है ।इस युद्ध मे विजय प्राप्त करने के बाद शत्रु का सदा के लिये नाश हो जाता है ,कोई शत्रु ही नही रह जाता ।इसकी विजय संपूर्ण व शाश्वत है ।

इसलिये हमे बाह्य शत्रुओं को जन्म देने वाले व आंतरिक – भीतर छिपकर बैठे हुये शत्रुओं का अंत करने के लिये प्रयास करना चाहिये ।

अगर युद्ध करना है ,जूझना है तो आत्मा के साथ जूझो।बाहरी युद्ध से क्या होना जाना है । शुद्ध आत्मा के द्वारा ही सच्चे सुख की प्राप्ति होगी ।आत्मा को जीत लिया तो सभी को जीत लिया ,इसके बाद किसी को जीत लेना शेष नही रहता ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s