अन्तराय कर्म – जिंदगी की किताब (पन्ना # 330)

अंतराय ( विघ्न या रुकावट ) कर्म …..

यदि आप कर्म के सिद्धांत व पूर्व जन्म के कर्मों का भुगतान मे विश्वास करते है तो आपको समझ आ जायेगा कि अंतराय कर्म क्या है ।

रोज़मर्रा की जिन्दगी मे हमे कभी आभास नही हो पाता है कि हम कोई अंतराय कर्म का भी बंध कर रहे है क्योंकि पिछले जन्म के कर्म का प्रभाव इस जन्म मे आ रहा है व इस जन्म का कर्म का प्रभाव अगले जन्म मे आता है । इस बात का अनुभव इस बात से भी कर सकते है कि कई बार कोई हम कार्य करना चाहते है लेकिन उसमें कोई ना कोई रोड़ा या अटकन आ जाती है,और सोचते है कि इतना सरल कार्य होने पर भी इतनी मुश्किलें क्यो आ रही ? आपने सोचा है इसका क्या कारण है ? ऐसी रुकावट का कारण हमारे अंतराय कर्म है । पिछले जन्म मे हमने किसी को कोई भी बात के लिये अंतराय डाले होते है जिसके कारण हमे इस जन्म मे उस कर्म के उदय होने से उस बात के लिये अंतराय पड़ते है । जिसके कारण दान , लाभ … आदि मे बाधा पड़ती है ।

यह कर्म पॉच प्रकार का होता है

1. दानान्तराय – इस कर्म के उदय से मनुष्य दान नही दे सकता । यदि कोई किसी को दान मे कुछ दे रहा हो और हम उसको ऐसा करने से रोकते है या हम किसी को दान देते समय मन मे ये भाव लाते है कि मजबूरीवश दान दे रहा हूँ वरना मन मे तो देने की ज़रा भी इच्छा नही थी तो दान अंतराय कर्म का बंध हो जाता है । जिसके कारण मनुष्य अगले जन्म इस कर्म के उदय होने से दान देने योग्य नही हो पाता है ।

2. लाभान्तराय – यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को उसके मिलने वाले लाभ मे बाधा पहुँचाता है या पहुँचाने का प्रयत्न करता है तो उस व्यक्ति को लाभांतराय कर्म का बंध होता है ।इसके फलस्वरूप उसे अगले जन्म मे इस कर्म के उदय होने से कोई देने वाला (उदार दाता ) होने पर भी दान का लाभ प्राप्त नही कर पाता है अथवा पर्याप्त सामग्री रहने पर भी उसे अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति नही हो पाती है । इसको एक उदाहरण से समझ सकते है कि कोई कपड़े का व्यापारी जानबूझकर किसी ग्राहक को कपड़े का पीस देते समय अपने फायदे के लिये कपडे को खींचकर माप लेता है ताकि कपड़ा कम कटे तो उसको लाभांतराय का बंध हो जाता है क्योंकि उसने अपने लाभ के लिये कपड़े के नापने मे चालाकी की ।

3. भोगान्तराय – यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे इंसान को भोगने वाली वस्तु के लिये अंतराय डालता है तो भोगंतराय कर्म का बंध पड़ता है । भोग यानि जो वस्तु एक बार भोगी जाय वह भोग है , जैसे खाने , पीने की वस्तु आदि । उस व्यक्ति को इस कर्म के उदय आने से भोग्य प्रदार्थ सामने होने पर भी वह भोग नही पाता है । उदाहरण के लिये यदि कोई इंसान या नौकर को खाने की इच्छा या भूख लगी हो और वह भोजन करने बैठता है तभी हम बोलते है कि पहले अमुक कार्य कर लो बाद मे भोजन करना । तो भोगंतराय का बंध हो जाता है ।

4. उपभोगान्तराय – यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को उपभोग करने वाली वस्तु मे रोड़ा या अटकन लाता है या लाने की कोशिश करता है तो उपभोगन्तराय कर्म का बंध होता है । जो वस्तु बार बार भोगी जा सके , वह उपभोग है । जैसे मकान , कपड़े , आभूषण …. आदि।इस कर्म के उदय से उपभोग्य प्रदार्थ होने पर भी भोगे जा नही सकते ।

5. वीर्यान्तराय – वीर्यन्तराय कर्म के उदय होने के अन्तर्गत व्यक्ति अपना सामर्थ्य प्रकट नही कर पाता है व जिस के प्रभाव से जीव के उत्थान , कर्म , वीर्य, पुरुषार्थ तथा पराक्रम क्षीण होते है ।

यदि हम किसी की प्रगति मे व्यवधान डालेंगे तो निश्चित रूप से हमे भी इसका भुगतान करना पड़ेगा । ऐसे ही यदि कोई किसी को धार्मिक या आध्यात्मिक मार्ग से विमुख करने की या प्रगति मे सहयोग देने की बजाय अंतराय डालने की कोशिश करता है तो उसे अंतराय कर्म का बंध होता है व अगले जन्म मे उसे आध्यात्मिक उन्नति ,संत महात्माओं का संग , धार्मिक कार्यों करने मे …आदि पाने मे दिक़्क़त आयेगी इसलिये हमे कभी भी किसी इंसान को किसी भी चीज मे अंतराय डालने से बचना चाहिये वरना हमे उस चीज के लिये अंतराय जरूर रहेगा ।


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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