नारी # जिंदगी की किताब (पन्ना # 346)

नारी एक , निभाती किरदार अनेक

हॉ मै नारी हूँ मै , जग का मूल हूँ

कोमलता का फूल हूँ मै

लक्ष्मी बनकर घर को बनाती और सँवारती है

अन्नपूर्णा बनकर भोजन बनाती है

गृहलक्ष्मी बन कर कुटुम्ब सम्भालती है

सरस्वती बन कर बच्चों को संस्कारों का पाठ पढ़ाती है

दुर्गा बनकर संकटों से जूझना जानती है

कालिका, चण्डी बन कर घर का रक्षण करती है

नारी संतान को जन्म देती है , नई जिन्दगी लाती है

मॉ बहन ,बेटी या पत्नी चाहे जो भी नारी का रूप हो सभी शक्ति का स्वरूप है

नारी वृक्ष समान है , घर की आन बान शान है

नारी बिना घर नही , जग का आधार होती है वो

इन्हें कमज़ोर समझने की कभी भी भूल ना करना


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद

4 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    Naari tere rup anek …..tere bagair jivan ki kalpanaa nahi…..magar aaj tun sankat men hai…..tumhen ab durga banna hoga …….shiva hamesha tere saath hain……bhasmasur ka tumhi ko ant karna hoga………

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    1. बहुत खूब लिखा आपने

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