एक नजर अंधविश्वास ,मन्नत पर # जिंदगी की किताब (पन्ना # 347)

एक नजर अंधविश्वास व मन्नत पर ….

जब हम भगवान या देवी देवता से कोई मन्नत मॉगते है व पूरी होने पर किसी वस्तु का चढ़ावा या प्रसाद या दर्शन ….जो भी बोलते है ओर किसी वजह से पूरा कर ना पाते है या देरी हो जाती है ,ऐसी स्थिती मे यदि घर मे कोई बड़ी परेशानी या विघ्न आ जाता है तो तुरंत हम यह मन मे भाव ले आते है कि हमने मन्नत पूरी होने पर प्रसाद, चढ़ावा ….करने के लिये बोला वह नही किया इसलिये देवी देवता अप्रसन्न हो गये है ।

सोचो जरा ! प्रभु या देवी देवता कभी किसी का अहित नही करते ,तभी तो वह भगवान पद को प्राप्त होते है , फिर क्यों हम अप्रत्यक्ष रूप से भगवान को दुख देने वाला या सज़ा देने वाला मानते है । ऐसा करके तो अंजाने मे ही सही ईश्वर की बहुत बड़ी विराधना कर जाते है ।

जो भी हम आज भुगत रहे है वह इस या पिछले जन्म कभी ना कभी हमारे द्वारा किये गये कर्मो का फल ही है । हमे भगवान या देवी देवता को बीच मे लाने की बजाय कर्मो की और ध्यान देना चाहिये । इस तरह के कई उदाहरण हमे अपने आसपास के माहौल मे देखने को मिलेंगे ,उसमे से एक उदाहरण …. राजस्थान मे ओसवालो की कुलदेवी बिरामी माताजी का मंदिर है उस मंदिर के लिये समाज के लोग ये बोला करते है कि वहॉ बेटा होने बाद उसका मुंडन करने के लिये की बेटे की मॉ ही जाने की हक़दार होती है जिन्हें बेटियॉ होती है वो नही जा सकती है । यदि कोई श्रद्धा भाव से दर्शन करने चली भी जाती है व बाद मे कभी कोई घर मे परेशानी या शारीरिक रोग हो जाता है ते तुरंत इसका सम्बंध इस प्रथा से कर दिया जाता है कि बेटी की मॉ वहॉ गई और इस वजह से देवी अप्रसन्न हो गई।

भगवान या देवी देवता के लिये सभी एक समान है चाहे वह स्त्री हो या पुरूष । वह कभी भेदभाव नही करते । सोचिये जरा यदि भगवान या देवी देवता किसी इंसान से ऐसी बातो से अप्रसन्न होते तो भगवान या देवी देवता का पद कैसे पाते । वह तो इन सब बातो से परे है ।तभी तो भगवान का पद पाते है ।

आज दुनिया मे विज्ञान ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है । हमे भी अपनी तुच्छ मानसिकता को बदलना होगा । इन सब अंधविश्वासों से स्वयं को व दूसरे को भी बाहर लाना होगा ।


ईश्वर से मन्नत मॉगने के विषय मे भी कुछ कहना चाहूँगी कि हम कोई भी कार्य पूरा होने के लिये ईश्वर से मन्नत मॉगते है कि अमुक कार्य होने पर इतना प्रसाद , रूपये , ज़ेवर …. चढ़ाऊँगा । वो भी पहले नही बल्कि कार्य पूरा होने पर चढ़ाया जाता है । हमने ई्श्वर को क्या समझ रखा है ? क्या वह प्रसाद , पैसो या ज़ेवरों का भूखा है ? मन्नत मॉगने पर भगवान भी हँसता होगा कि कैसा नादान इंसान है जो मुझसे तुच्छ वस्तुयें मॉग रहा है ( वह मन्नत मॉगता है तो भी किस चीज की … मेरे घर मे संतान हो जाये , बेटा हो जाये या नौकरी , विवाह , मकान , बीमारी ,परीक्षा मे पास …. और भी अनेकों बाते ) । भगवान से हम जो अमूल्य चेक भुनवा सकते है उसकी जगह तुच्छ चीज़ों का चेक भुनवा लेते है । हमे भगवान से संकट के समय उसको टालने की प्रार्थना करने की बजाय अनंत शक्ति मॉगनी चाहिये कि हे ईश्वर मुझे इतनी शक्ति दे कि इस आये संकट को अच्छी तरह से पार कर सकूँ । भगवान से ये मॉगना चाहिये कि हे ईश्वर मुझे इस क़ाबिल बनाओ कि जरूरतमंद , दीन दुखियों की मदद कर सकूँ । अरे मॉगना है तो हमेशा ये मॉगो कि हे ईश्वर जिस तरह आप नर से नारायण बने हो , आत्मा से परमात्म दशा तक पहुँचे हो ,मुझे भी इस दशा तक पहुँचाने मे मदद करो ,आपकी तरह स्वरूप बनने की शक्ति दो ।


यदि लक्ष्मी जी की पूजा इस कामना के साथ कि हमारे घर मे पैसो की बरसात हो सोचकर करे ,यदि ऐसा करना सही होता तो लक्ष्मीजी की कृपा हर इंसान पर बरसती व भारत का हर व्यक्ति अमीर होता । अमेरिका के पास इतना पैसा क्यो है ? जबकि वहॉ कोई भी लक्ष्मीजी को नही पूजता । लक्ष्मी, पुण्य और पाप के अधीन है। इसलिए यदि लक्ष्मी चाहिए तो हमें पुण्य-पाप का ध्यान रखना चाहिए, कर्मों को सुधारना चाहिये । ऐसा करने से लक्ष्मी जी की हम पर अपार कृपा बरसेगी , सब देवी देवता हम पर प्रसन्न रहेंगे ।


अंत मे यही कहना चाहूँगी कि पूजा या धार्मिक क्रियाये गलत नही है , बस मन के भावो को सुधारने की जरूरत है ।श्रद्धा व विश्वास से की गई पूजा पुण्य का बंध करती है ।हमेशा मन मे यही विश्वास रखे कि ईश्वर हमेशा हमारे साथ है वह कभी भी हमारा अहित नही होने देगा ।


आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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