जहां चाह ,वहॉ राह # जिंदगी की किताब (पन्ना # 348)

सोलह साल का दीनू बहुत नटखट बच्चा था । स्कूल से आने के बाद कुछ ऐसी दिनचर्या थी कि खाना खाते समय टीवी देखना , फ़ोन पर दोस्तों से बात करना , थोड़ी देर सोकर शाम को दोस्तों के साथ खेलना व जैसे तैसे होमवर्क पूरा करना ताकि टीचर से सज़ा न मिले । पूरी तरह से मौज मस्ती । उसके मॉ पिताजी हमेशा समय की वेल्यू व पढाई के प्रति ध्यान देने के साथ ईश्वर का स्मरण करने के लिये समझाते रहते लेकिन कोई असर नही पड़ता ।

उसके मॉ पिताजी धार्मिक विचारो के थे और वो अपने सतगुरू की कही बात का पूरी तरह से पालन करते । जब भी उस शहर मे सत्संग का आयोजन होता तो वह गुरूजी को अपने घर मे ठहराते ।

एक दिन सतगुरू कुछ दिनो के लिये उनके शहर मे प्रवचन के लिये आये । उनके यहॉ रूके । बातों ही बातों मे पिता ने अपने बेटे के बारे मे ज़िक्र किया । शाम को सभी बैठे थे तभी दीनू बाहर से खेलकर आया और गुरूजी को प्रणाम किया ।गुरूजी ने प्यार से उसे अपने पास बिठाया व पढाई व दिनचर्या पूछने लगे । बातो ही बातो मे गुरूजी ने उसे एक महँगी लेकिन गंदी चादर लाने को बोला व उसकी कीमत पूछी ।दीनू बोला गुरूजी इस गंदी चादर की कीमत तो 200 रूपये से ज्यादा ना होगी । गुरूजी ने कहा कि इसे बेचकर 400/ रु लेकर आओ। दीनू गुरूजी की बात को टाल ना पाया और बोला कि ठीक है गुरूजी । दीनू ने उस चादर को अच्छे से धोया और आयरन करके अच्छे से फॉल्ड किया । अगले दिन उसे लेकर पास के बाज़ार मे गया, जहां कई घंटों की मेहनत के बाद वह चादर चार सौ रु में बेच पाया ।

अगले दिन गुरूजी ने फिर उसे दूसरी चादर देकर 600 रु में बेचने को कहा।अब भी दीनू गुरूजी की बात को टाल ना पाया इसलिये वह इस बार अपने एक पेंटर दोस्त की मदद से उस चादर पर सुन्दर चित्र बना कर रंगवा दिया और बीच बाजार में बेचने के लिए पहुंच गया। एक व्यक्ति ने उसके आकर्षक रंगो को देखकर वह चादर 600 रु में खरीद ली । जब दीनू वापस आया तो गुरूजी ने फिर एक और चादर हाथ देकर उसे 2500 हज़ार रु में बेचने को कहा। अब दीनू का उत्साह बढ़ रहा था व इसे 2500 रूपये से ज्यादा रूपये मे बेचने की लालसा हो रही थी ।

इस बार दीनू को काफी कुछ आईडिया था कि इस चादर की ज्यादा कीमत कैसे मिल सकती है । वह शहर के सबसे बड़े शॉपिंग मॉल मे गया जहॉ बड़ी बडी हस्तियॉ ख़रीदारी के लिये आती थी । उस समय सौभाग्य से एक नामी क्रिकेटर आया हुऑ था । दीनू ने उसके पास पहुँचने के लिये थोड़ी कोशिश की और उस तक पहुँचने मे सफल हो गया । उसने चादर पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए। ऑटोग्राफ लेने के बाद दीनू मुख्य बाजार गया और उस चादर की बोली लगाई। बोली तीन हज़ार से शुरू हुई और एक अमीर महिला जो उस क्रिकेटर की फ़ैन थी उसने वह चादर उससे 10,000 रु में ले ली ।

खुशी से रूपये लेकर दीनू घर पहुँचा और गुरूजी ,मॉ बापू को कमाई के रूपये दिये तो खुशी से मॉ पिता की आंखों में आंसू आ गए। अब गुरूजी ने दीनू से प्रश्न किया कि बताओ बेटा इतने दिनों से तुमने चादर बेचते हुए क्या सीखा ?दीनू बोला कि गुरूजी मैंने ये सीखा कि कोई भी कार्य करने से पहले उस कार्य को जानना व समझना है ,फिर आत्मविश्वास जगाना है कि मै उसे कर सकता हूँ ,फिर पूरी लगन से उस मन्ज़िल को हासिल करने के लिये बढ़ते जाना है । कहते है ना जहां चाह होती है वहॉ राह अपने आप निकल आती है।

गुरूजी बोले कि बेटा तुम बिलकुल सही कह रहे हो । मगर मेरा ध्येय तुमको यह भी समझाना था कि चादर गंदी होने के कारण इसकी कीमत बढ़ाने के लिए उसे धोकर साफ़ करना पड़ा । फिर और ज्यादा कीमत पाने के लिये उसको आकर्षक खूबसूरत रंग से सजाना पड़ा । उससे भी ज्यादा कीमत मिली जब एक नामी क्रिकेटर ने उस पर अपने नाम के दस्तखत कर दिये ।

सोचो बेटा जब इंसान इन बेजान वस्तुओ की कीमत अपने हिसाब से बढा सकता है तो फिर खुदा जिसने हम मनुष्यों को बनाया है क्या वो हमारी कीमत कम होने देंगा ? ये तुम्हे मालूम चल ही गया कि इंसान के पास इतनी शक्ति है कि यदि चाहे तो कुछ भी कर सकता है । पर वह उसे जगाता नही है ।

बेटा दूसरे क्षेत्रों की तरह हम आध्यात्मिकता के क्षेत्र मे भी उन्नति कर सकते है । पर इसमे आगे बढने के लिये सतगुरू की आवश्यकता होती है । अज्ञानता के कारण हमारी आत्मा पर आवरण आ जाने के कारण मैली हो गई है लेकिन सतगुरू , ज्ञानी पुरूष सबसे पहले मैली जीवात्माओं को अपने ज्ञान के प्रकाश से साफ़ और स्वच्छ करते हैं ।जिससे परमात्मा की नज़र में हम जीवात्माओं की कीमत थोड़ी बढ़ जाती है । फिर वो हमारी जीवात्माओं को निरंतर अपने ज्ञान से रंगते रहते है जिसे मनुष्यपन की कीमत और ज्यादा बढ़ जाती है। ज्ञान मे रंगते रहने से एक दिन सतगुरु का राजीपो इस कदर हम पर उतरता है कि उनकी कृपा की मोहर हमारे पर पूरी तरह लग जाती हैं । फिर तो इंसान निरंतर सुख ,कभी भी खत्म नही होने वाला आनंद पाकर अपनी कीमत का अंदाज़ा ही नही लगा सकता।

लेकिन बेटा आज अफ़सोस इस बात का है कि इतना कीमती इंसान अपने आप को चंद भौतिक सुख की खातिर अपनी जिन्दगी कौड़ियों के दाम खर्च करते जा रहा है । उसने अपने आप को पहचाना ही नही है ।उसे मालूम ही नही है कि सुख मानकर जिस चीज के पीछे जिन्दगी भर भागता है उससे भी शांति नही मिलने वाली । लेकिन यदि वह उससे कम समय भी आध्यात्मिक उन्नति मे खर्च करता तो उसे सुख के लिये इधर उधर भटकने की जरूरत ही नही पडती ।

बेटा मै ये नही कहता हूँ कि तुम दोस्तों से मिलना ,खेलना कूदना ,घर परिवार समाज देश के प्रति अपने कर्तव्यो को , खाना पीना , …. छोड दो बल्कि उन कर्तव्यो के साथ भी सतगुरू की बातो का पालन करते हुये अपनी जिन्दगी को सुनहरी बना सकते हो बल्कि मै तो यह कहता हूँ कि आध्यात्मिकता मे मजबूती सब कर्तव्यो को साथ मे करते रहने से और बढ जाती है , हमे मालूम चलता है कि हर परिस्थिती मे हम कितना ज्ञान मे रहकर समता मे रह सकते है ।

बेटा मै तो यही चाहता हूँ कि हर इंसान का परमात्मा से मिलन हो व उसका मनुष्य जीवन सफल हो । आशा है बेटा तुम मेरी बात को समझ पा रहे हो ।

दीनू बहुत ही प्रसन्नता व खुशी से गुरू के चरण स्पर्श करता हुआ बोलता है कि गुरूजी समझ गया ,आपने बहुत अच्छे तरीके से समझाया । मै प्रॉमिस करता हूँ कि सब कार्यों के साथ आध्यात्मिकता मे भी उन्नति करूँगा ।

इस कथा का सारांश ये है जिस प्रकार पढाई व अन्य कार्य को हम अपनी जिन्दगी मे जितना महत्व देते है वैसे ही स्पिरिटयूअल साइंस को भी महत्व दे तो हमारी जिन्दगी सुख व शांति व आनंद के साथ अच्छी तरह व्यतीत होगी ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

2 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    खूबसूरत कहानी के साथ साथ बहुत ही बढ़िया संदेश।👌👌

    Liked by 1 person

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