विचारणीय बात # जिंदगी की किताब (पन्ना # 349)

विचारणीय योग्य बात है कि क्यो दिनोंदिन अपनापन ख़त्म होता रहा है , दुरियाँ बढ रही है ?

जब भी हम परिस्थितियों को अपने अनुकूल नही पाते है तो यह कह देते है कि ज़माना बदल गया है लेकिन सच्चाई यह है कि ज़माना इतना नही बदला है जितना हम अपने आप मे बदले है ।संस्कारों मे बदलाव आया है , विचारधाराओं मे बदलाव आया है , जीवन शैली मे बदलाव आया है ।पहले व्यक्ति किसी की भी बात को सुनकर विचार करता था , अपने भीतर उसका मूल्याँकन करता था । उसके पश्चात अपने विचारों से दूसरे को अवगत कराता था । यदि उसके विचारों से सहमत नही होते थे तो व्यर्थ मे बहस नही की जाती ।

आज हर व्यक्ति अपने आपको सबसे ज्यादा बुद्धिमान मानकर बहस करके अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करता है व चाहता है कि सभी उसकी बात से सहमत हो चाहे वह गलत भी क्यो ना हो । परिणामस्वरूप आपस मे मन मुटाव हो जाता है । कहने को तो कहा जाता है कि इस संसार मे सबको अपनी बात कहने का अधिकार है लेकिन इसका नतीजा क्या निकल रहा है ? आज हर व्यक्ति दूसरे पर अपना प्रभुत्व ज़माना चाहता है , एक दूसरे को दबाना चाहता है । चाहता है कि वह दूसरे से दबकर नही रहे सभी उसे दबकर रहे । इसका परिणाम कितना घातक होता जा रहा है । अपनापन ख़त्म हो रहा है ,दूरियाँ बढ़ती जा रही है ,आपसी सदभाव , प्रेम ,विश्वास ,मान सम्मान समाप्त होता जा रहा है ।

यदि हम सभ्य समाज,उन्नत व प्रगतिशील देश की आशा रखते है तो हमे अपने आप मे बदलाव लाना होगा ।दूसरो को झुकाने से पहले ख़ुद को झुकाना होगा । अकड़ हटानी होगी क्योंकि यह दुनिया का क़ायदा है कि जितना हम अकड़ रखेंगे दूसरा उससे ज्यादा अकड़ दिखायेगा ।

संस्कारों ,विचारधाराओं , जीवन शैली मे बदलाव आया है । अहं ,स्वार्थ की भावना ,मुँह पर अच्छा लेकिन दिल मे कड़वाहट आदि अनेकों बाते रिश्तो को खोखला करती जा रही है


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

2 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    bahut khunsurat vichaar…..sundar samaaj akadpan se nahi prem se banta hai.

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    1. सही बात है … धन्यवाद

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