मृत्युभोज के नाम एक संदेश # जिंदगी की किताब (पन्ना # 360)

🔸जिस घर मे पुत्र शोक पर क्रंदन कर रहे मॉ पिता

वहॉ भोजन का निवाला तुम्हे कैसे भाता होगा ?

🔸जिस घर मे सूनी मॉग लिये रोती बिलखती विधवा युवती

वहॉ बडे चाव से पंगत खाते हुये तुम्हे ज़रा भी पीड़ा नही होती ?

🔸जिस घर मे रक्षा सूत्र लिये बहना अपने भाई की याद मे तड़पती

वहॉ रस लेकर खाते हुये तुम्हारा दिल नही भर आता ?

🔸जिस घर मे कोई भी व्यक्ति बन गया हो काल का ग्रास

वहॉ भोजन निवाला लेते समय दिल मे नही होता है त्रास ?

🔸शोकाकुल परिवार के प्रति अपना सदव्यवहार निभाओ

धर्म यही सिखलाता है मित्रो मृत्युभोज को ना खाओ

🔸चला गया जिस परिवार के अंग का कोई हिस्सा

उस परिवार के लिये ये वज्रपात से क्या कम है

🔸परंपरा की चक्की मे पीसकर जैसे तैसे परिजन को तेरहवीं खिलाते

अंधी परंपरा के पीछे मन मे ऑसू लिये जीते जी मर जाते

🔸आओ सब मिलकर इस कुरीती को जड़ से दूर करे

सांत्वना देने जाये ज़रूर पर मृत्युभोज को नही खाये

इस संदेश का आशय किसी को दुख पहुचॉना नही है, अगर किसी को hurt हो गया हो तो क्षमायाचना 🙏🙏


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

6 Comments Add yours

  1. Kumar Parma says:

    Bahut hi khubsurti se pes kiya aapne. Such me hame ye parampara chorni chaiyen.

    Liked by 1 person

    1. Vimla wilson says:

      हॉ इसी की जरूरत है । मैंने काफी लोगो को पैसे उधार लेकर भी इस परंपरा को निभाते देखा है समाज के डर से । एक तो मृत्यु का दुख उस पर भोजन की व्यवस्था करना शोकसंतृप्त परिवार के लिये मुश्किल हो जाता है … बहुत बहुत शुक्रिया पसंद करने के लिये

      Like

  2. Madhusudan says:

    जिस घर मे कोई परिवार की मृत्यु हो जाती है उस घर मे चूल्हा नहीं जल पाता।लोग वियोग में चीखते रहते हैं।ऐसे में जिंदा घरवाले भी मर जायेंगे।कल इसी दर्द को देख गाँव के लोग संग खाने का रिवाज चलाया गया होगा जो बाद में आडम्बर के गिरफ्त में आकर खर्चीला बन गया।लोग दर्द में होते हैं मगर जब पंगत लगती है ऐसा नही की बाकी लोगों को खाने की इक्छा होती है मगर नियम को मानते हुए खाते है और साथ मे घरवाले भी। जिसने भी ये नियम बनाया कहीं से भी गलत नही प्रतीत होता।ये मेरा निजी राय है।
    वैसे परिवर्तन संसार का नियम है।कुछ भी बदला जा सकता है साथ ही कलियुग में अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है।
    इस युग मे धर्म नही,
    आडम्बर का राज रहेगा,
    लोगों को समझना मुश्किल हो जाएगा
    धर्म क्या है और आडम्बर क्या।

    Liked by 1 person

    1. Vimla wilson says:

      तेरहवीं पर भोज प्रथा का प्रबंध हो सकता है परिवार के दर्द को देखकर शुरू किया होगा लेकिन आज इसका रूप ही बदल गया …लोग उधार लेकर भी इस प्रथा को निभाते है समाज के डर से । कही कही अमीर लोग इस समय काफी पकवान भी बनाते है । मेरा मानना है कि परिवार के दूसरे लोग शोकाकुल परिवार को ढाढ़स बँधाते हुये भोजन कराये व मृत व्यक्ति की आत्मा की शान्ति के लिये प्रार्थनाये करे जिससे परिवार व मृत व्यक्ति को शान्ति महसूस हो … बहुत बहुत शुक्रिया !

      Like

      1. Madhusudan says:

        आज प्रत्येक सही कार्य आडम्बर में घिर गया है।दुख पहला दिन ज्यादा होता है घर के लोग आरम्भ में ही जान देने की स्थिति में होते हैं अतः खान पान आरम्भ में ही होना चाहिए और बारहवीं के बाद दिए जानेवाले भोज सिर्फ गरीबो और भूखों के लिए होना चाहिए ताकि दिवंगत आत्मा को शांति और दुआ मिल सके मगर हम आडम्बर में घिर गरीबों और भूखे के बदले भरे पेट वालों को भोज देते है।ये मेरा निजी राय है।सुक्रिया आपने सामाजिक मुद्दों से जुड़े विषय को चुना जिसपर हमे अपनी राय देंने का मौका मिला।

        Liked by 1 person

        1. Vimla wilson says:

          सही कहा , आपकी राय का स्वागत है … बहुत बहुत शुक्रिया

          Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s